रिसर्च आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने की है जिसके मुताबिक इंसान ने 8300 साल पहले उत्तराखंड में बसना शुरू कर दिया था।
आज से करीब 8300 साल पहले उत्तराखंड की हिमालयी वादियों में इंसान अपने परिवारों के साथ रह रहा था। वह धान की खेती करता था, मिट्टी के बर्तन बनाता था और तांबे का उत्खनन भी करता था। यानी उत्तराखंड में मानव बसावट की शुरुआत अब तक माने जा रहे इतिहास से हजारों
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अब तक वैज्ञानिक उत्तराखंड में मानव सभ्यता के सबसे पुराने ठोस प्रमाण करीब 4 हजार साल पुराने मानते रहे हैं। लेकिन आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च ने इस इतिहास को सीधे 8300 साल पीछे पहुंचा दिया है।
वैज्ञानिकों को इसके प्रमाण सेडा-DNA तकनीक से मिले हैं। यह शोध इंटरनेशनल साइंस् मैगजीन क्वाटरनरी साइंस रिव्यूज में पब्लिश हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज हिमालय में मानव बसावट के इतिहास को लेकर अब तक की वैज्ञानिक समझ को नई दिशा दे सकती है।
सैंपल लेते आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक।
पहले उत्तराखंड का सबसे पुराना इतिहास क्या माना जाता था?
अब तक उत्तराखंड में मानव उपस्थिति के सबसे पुराने ठोस प्रमाण करीब 4 हजार साल पुराने माने जाते थे। अल्मोड़ा की लगभग 3 हजार साल पुरानी रॉक आर्ट, रूपकुंड और मलारी से मिले करीब 1300 साल पुराने मानव कंकाल तथा बाद के मंदिर-मठ राज्य के सबसे पुराने पुरातात्विक साक्ष्य थे। नॉटिंघम विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में मानव उपस्थिति करीब 4600 साल पुरानी बताई गई थी, लेकिन इससे पीछे का इतिहास वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हो पाया था।

अल्मोड़ा की गुफाओं पर बने चित्र और चमोली में स्थित रूपकुंड में मिले कंकाल।
वैज्ञानिकों ने आखिर खोज कहां की?
रिसर्च का केंद्र बना चमोली जिले के गोपेश्वर क्षेत्र की तोली ताल, जो समुद्र तल से 2650 से 2800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मीठे पानी की झील है। आईआईटी रुड़की के डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ साइंस के प्रोफेसर डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने झील की तलहटी में कई मीटर गहराई तक ड्रिलिंग कर तलछट के नमूने निकाले। इन नमूनों को पांच विश्लेषणात्मक इकाइयों में बांटकर उनकी उम्र, जैविक अवशेष और पर्यावरणीय बदलावों का अध्ययन किया गया।

झील की मिट्टी ने 18 हजार साल का इतिहास कैसे बताया?
झील की तलहटी में हर साल मिट्टी की एक नई परत जमा होती जाती है। हजारों साल बाद यही परतें प्राकृतिक इतिहास का रिकॉर्ड बन जाती हैं। अध्ययन में पता चला कि 18,100 से 13,600 साल पहले यह इलाका बेहद शुष्क था। यह हिमयुग के अंतिम चरण यानी लेट ग्लेशियल मैक्सिमम का समय था। इसके बाद ग्लेशियर पीछे हटे, तापमान बढ़ा, नमी बढ़ी और धीरे-धीरे यहां जंगल विकसित होने लगे। इसी बदलते पर्यावरण के बीच इंसानों की मौजूदगी के संकेत भी मिलने लगे।
सेडा-DNA ने कैसे बताया कि यहां 8300 साल पहले इंसान रहते थे?
आमतौर पर पुरातत्वविद किसी सभ्यता का पता कंकाल, औजार या बर्तनों से लगाते हैं। लेकिन सेडा-DNA तकनीक मिट्टी में मौजूद हजारों साल पुराने सूक्ष्म जैविक अंशों को पढ़ती है। जब कोई इंसान किसी जगह रहता है तो उसकी त्वचा की कोशिकाएं, बाल, मल या अन्य जैविक कण मिट्टी में मिल जाते हैं।
ये डीएनए के सूक्ष्म अंश हजारों साल तक सुरक्षित रह सकते हैं। आधुनिक जीनोमिक तकनीक इन्हीं अंशों की पहचान कर यह बताती है कि उस समय वहां कौन-कौन से जीव, पौधे और इंसान मौजूद थे। तोली ताल की तलहटी में मिले ऐसे ही डीएनए संकेतों ने करीब 8300 साल पहले मानव उपस्थिति की पुष्टि की।

सिर्फ इंसान नहीं, खेती और तांबा उत्खनन के भी मिले संकेत
रिसर्च में मिले जैविक और पर्यावरणीय साक्ष्य बताते हैं कि उस समय यहां रहने वाले लोग केवल शिकार पर निर्भर नहीं थे। वे खेती कर रहे थे और तांबे जैसे प्राकृतिक संसाधनों का भी उपयोग कर रहे थे।
इसके अलावा झील की तलहटी से करीब 3300 साल पुराने मिट्टी के बर्तनों के अवशेष मिले। वहीं लगभग 2400 साल पुराने पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) के निशानों ने यह साबित किया कि उस समय मनुष्य आग का उपयोग कर रहा था।

सभी नमूनों की जांच उच्च स्तरीय लैबों में की गई, सैंपल भी सुरक्षित तरीके से रखे गए थे।
यह खोज क्यों मानी जा रही है ऐतिहासिक?
यह शोध सिर्फ उत्तराखंड का इतिहास कुछ हजार साल पीछे नहीं ले जाता, बल्कि पूरे हिमालय में मानव बसावट की वैज्ञानिक समझ को चुनौती देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि उत्तराखंड की दूसरी हिमालयी झीलों में भी इसी तकनीक से अध्ययन किया जाए तो 8300 साल से भी पुराने मानव इतिहास के प्रमाण मिल सकते हैं। ऐसे में हिमालय में मानव सभ्यता की शुरुआत को लेकर दुनिया की इतिहास पुस्तकों में भी बदलाव संभव है।
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