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Supreme Court Challenges CBSE Three-Language Policy


नई दिल्ली6 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल उठाए। कोर्ट ने किताबों और टीचरों की कमी, बच्चों पर पड़ने वाले बोझ और अलग-अलग स्कूलों में पॉलिसी लागू करने के तरीके पर भी जवाब मांगा।

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा- “क्या यह देश के लिए अच्छा नहीं होगा अगर उत्तर भारतीय छात्र दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखें और दक्षिण भारत के छात्र उत्तर भारतीय भाषाएं सीखें?”

बेंच CBSE की 9वीं क्लास के बच्चों के लिए NEP 2020 के तहत लागू थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि पॉलिसी के तहत बच्चों को दो भारतीय ‘मूल’ भाषाएं पढ़नी होंगी, जबकि कई स्कूलों में इसके लिए जरूरी किताबें, शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।

कोर्ट को बताया गया कि स्कूल शुरू होने के 4 महीने बाद भी कुछ स्कूलों में किताबें नहीं हैं। इससे परीक्षा देने वाले लाखों छात्रों पर असर पड़ रहा है।

याचिका में किताबों की कमी का मुद्दा उठा था

बहस के दौरान याचिकाकर्ता के वकील आनंद ग्रोवर ने पूछा- “बच्चा अचानक पंजाबी, तमिल कैसे सीखेगा। उसे वर्णमाला से शुरुआत करनी होगी। लेकिन किताबें देखिए, वे वाक्यों से शुरू होती हैं। इसलिए फ्रेंच सीखने वाले स्टूडेंट्स को इसे जारी रखने की परमिशन मिलनी चाहिए।’

एक राज्य के छात्र को दूसरे राज्य की भाषा सीखने के लिए कहना अतिरिक्त बोझ बन सकता है और हर जगह इसे लागू करना आसान नहीं होगा। अगर बच्चों से नई भाषाओं में पासिंग मार्क्स लाने को कहा गया, तो उन पर प्रेशर बढ़ेगा।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत के कमेंट…

  • पॉलिसी में पहले से सीखी जा रही भाषाओं को छोड़ने की बात नहीं है। पहले पढ़ाई जा रही भाषाओं का बायकॉट करने का कोई सवाल नहीं है। बच्चे उन्हें जारी रख सकते हैं।
  • क्या यह देश के लिए अच्छा नहीं होगा कि उत्तर भारत के छात्र दक्षिण भारत की भाषाएं सीखें और दक्षिण भारत के छात्र उत्तर भारत की भाषाएं सीखें?
  • क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर हीन भावना की कोई धारणा नहीं बननी चाहिए। हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए। इंटरनल असेसमेंट स्कूलों पर इसलिए छोड़ा गया है, ताकि छात्रों पर बिना जरूरत दबाव न पड़े।

99.19% स्कूलों में 2 भारतीय भाषाएं पढ़ाई जा रहीं

इसके बाद कोर्ट ने टीचर्स और पॉलिसी लागू करने के लिए स्कूलों में जरूरी फैकल्टी होने का मुद्दा उठाया। ASG भाटी ने CBSE के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 99.19% स्कूल पहले से 2 भारतीय भाषाएं पढ़ाने की शर्त पूरी कर रहे हैं। करीब 235 स्कूल इस शर्त को पूरा नहीं कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि 7वीं से 9वीं के छात्रों के लिए बदलाव की प्रक्रिया फ्लेक्सिबल होगी। शुरुआत में इसे बुनियादी स्तर पर लागू किया जाएगा, ताकि ज्यादा समानता लाई जा सके।

NEP 2020 के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग समय पर लागू किए जा रहे हैं। मौजूदा प्रक्रिया के जरिए मातृभाषा वाले हिस्से को लागू किया जा रहा है। 5वीं से 10वीं तक पांच साल का समय स्टूडेंट्स को भाषाएं सीखने के लिए काफी होगा।

संस्कृत शिक्षकों की योग्यता पर सवाल

कोर्ट ने संस्कृत जैसी भाषाओं के लिए टीचर्स की मौजूदगी पर भी बोर्ड से सवाल पूछे। जस्टिस बागची ने पूछा, “हमारे स्कूलों में कितने संस्कृत शिक्षक बीएड की योग्यता रखते हैं?”

उन्होंने नीति को लागू करने के व्यापक तरीके पर भी सवाल उठाए। इसमें अलग-अलग तरह के स्कूलों पर नीति लागू करना और उनके लिए जरूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करना शामिल है।

जस्टिस बागची ने कहा कि पॉलिसी को इससे छोटी क्लास से लागू किया जा सकता है। इससे माता-पिता को अपने बच्चों के लिए भाषाएं चुनने का ज्यादा अवसर मिल सकता है।

‘नेटिव’ शब्द और अंग्रेजी को लेकर संवैधानिक सवाल

जस्टिस बागची ने कहा, “मुझे ‘नेटिव’ शब्द को लेकर आपत्ति है, क्योंकि इसकी औपनिवेशिक जड़ें हैं। इसे ‘इंडिजिनस’ होना चाहिए। NEP 2020 बनाने वालों को ‘नेटिव’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर सावधान रहना चाहिए था।”

जस्टिस बागची ने कहा, “अंग्रेजी को स्वदेशी या गैर-स्वदेशी कहा जा सकता है या नहीं, हमें इसकी संवैधानिकता देखनी होगी।”

पहले नीति लागू कर अनुभव देखने की बात

बेंच ने यह भी चर्चा की कि नीति लागू होने के बाद सामने आने वाली दिक्कतों को क्या बाद में दूर किया जा सकता है।

CJI ने कहा कि पहले नीति को लागू होने दिया जा सकता है। इसके बाद स्कूलों और छात्रों को आने वाली परेशानियों का आकलन किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, “जो भी लागू किया गया है, उसे अनुभव करने दीजिए। अनुभव के बाद कुछ दिक्कतें आएंगी, तब हम उनकी जांच करेंगे।”

CJI ने कहा कि बाद में सामने आने वाली अनदेखी दिक्कतों की जांच एक्सपर्ट कमेटी या संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ कर सकते हैं। वे नीति में बदलाव की सिफारिश दे सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या छात्रों को नई भाषा की शर्त के तहत तुरंत परीक्षा देनी होगी। CJI ने कहा कि भाषा इस साल बिना परीक्षा के शुरू की जा रही है और छात्रों को उससे परिचित होने के लिए समय मिलना चाहिए।

CJI ने CBSE से याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाई गई चिंताओं को देखते हुए नीति को व्यवस्थित करने पर विचार करने को कहा। उन्होंने कहा, “इन संदेहों पर आप दोबारा विचार कर सकते हैं। नीति को कैसे व्यवस्थित किया जाए? आप एक विशेषज्ञ संस्था हैं।”

कोर्ट ने संकेत दिया कि इस मामले में संवैधानिक और व्यावहारिक, दोनों तरह के सवाल शामिल हैं। इनमें भाषाओं का वर्गीकरण, शिक्षकों और किताबों की उपलब्धता, छात्रों पर बोझ और अलग-अलग भाषाई परिस्थितियों वाले स्कूलों में नीति लागू करने का तरीका शामिल है।



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