24 मिनट पहले
- कॉपी लिंक
अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था के 5 महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। जिनका इस्तेमाल ईरान दूसरे देशों में अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए करता है।
इनमें डिजिटल एसेट्स (जैसे क्रिप्टोकरेंसी), टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग के क्षेत्र शामिल हैं। अमेरिका इन क्षेत्रों के जरिए ईरान की कमाई और अंतरराष्ट्रीय कारोबार को रोकना चाहता है।
यानी अगर कोई देश इन क्षेत्रों में ईरान के साथ ऐसा कारोबार करता है जिससे उसे पैसा या आर्थिक फायदा मिलता है। तो अमेरिका उस देश पर भी प्रतिबंध लगा सकता है या उसे अमेरिकी डॉलर की वित्तीय व्यवस्था से बाहर कर सकता है।
अमेरिका ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन देशों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जाएंगे। हालांकि, चीन, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं।

अमेरिका बोला- अब ईरान के पास सिर्फ दो रास्ते बचे
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि हमने ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू किया है। यह ईरान और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ एक अभियान है।
ईरान के सामने अब सिर्फ दो रास्ते हैं। पहला- पूरी तरह से दुनिया से अलग-थलग पड़ना और गुजारे लायक अर्थव्यवस्था। दूसरा- फिर से सामान्य स्थिति की ओर बढ़ना और वैश्विक अर्थव्यवस्था में फिर से शामिल होने का मौका पाना।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है, 5 पॉइंट में समझें…
ईरान के साथ आर्थिक संबंध खत्म करने के अमेरिकी प्रतिबंधों पर भारत पर असर पड़ सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर सीधे अमेरिकी प्रतिबंध लग जाएंगे।
तेल: भारत ईरान से कच्चा तेल खरीदता है तो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भुगतान और खरीद मुश्किल हो सकती है।
चाबहार पोर्ट: ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत की रणनीतिक और कारोबारी रुचि है। अमेरिकी प्रतिबंधों का असर इस परियोजना पर पड़ सकता है।
डॉलर में भुगतान: अगर ईरान से जुड़े भारतीय कारोबार पर अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंध लगते हैं, तो डॉलर में लेन-देन करना मुश्किल हो सकता है।
व्यापार: ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों को अमेरिकी नियमों का पालन करना पड़ सकता है।
कूटनीतिक दबाव: अमेरिका भारत से भी ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने को कह सकता है। हालांकि, भारत अपने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा जरूरतों के आधार पर फैसला करेगा।

भारत के तेल आयात पर कितना असर?
फिलहाल भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान से नियमित रूप से तेल आयात नहीं कर रहा है। हालांकि, मध्य पूर्व में संघर्ष के दौरान जब ट्रंप प्रशासन ने समुद्र में ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी थी तब भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए ईरान से कच्चा तेल खरीदा था।
पिछले कुछ महीनों में ईरान से भारत को कच्चे तेल की नई खेप नहीं मिली है। हालांकि, एक्सपर्ट के मुताबिक असली जोखिम तेल की कीमतों को लेकर है। चीन ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है।
अगर अमेरिकी दबाव के कारण चीन ईरान से तेल खरीद घटाता है और दूसरे स्रोतों से तेल लेने लगता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा।
भारत-ईरान कारोबार पर क्या असर होगा?
भारत और ईरान के बीच कारोबार पहले ही काफी घट चुका है। भारत का ईरान को निर्यात वित्त वर्ष 2019 के 3.5 अरब डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2026 में 1.2 अरब डॉलर रह गया है।
वित्त वर्ष 2026 में भारत के प्रमुख निर्यात में 81 करोड़ डॉलर का चावल, 8.2 करोड़ डॉलर की चाय और कॉफी, 6.3 करोड़ डॉलर की दवाएं, 5.4 करोड़ डॉलर के केले, 4.8 करोड़ डॉलर की चीनी और 3.4 करोड़ डॉलर की दालें शामिल थीं।
वहीं, ईरान से भारत का आयात वित्त वर्ष 2019 के 13.5 अरब डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2026 में 37.5 करोड़ डॉलर से भी कम रह गया। वित्त वर्ष 2019 में इसमें 12.4 अरब डॉलर का कच्चा तेल शामिल था।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका की ओर से घोषित सेकेंडरी सैंक्शंस का भारत पर सीधा कितना असर पड़ेगा।
———————–
ये खबर भी पढ़ें…
ईरान होर्मुज में जहाजों से टोल वसूलेगा, संसद की मंजूरी

ईरान की संसद ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल यानी टैक्स या फीस लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक, जिन देशों के जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति होगी, उनसे समुद्री सेवाओं के बदले शुल्क लिया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…














