नई दिल्ली: इंडिया टीवी के लोकप्रिय शो “कॉफी पर कुरुक्षेत्र” में गुरुवार (27 अगस्त) को इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक तरफ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लगातार कई बड़े ऐलान कर रहे हैं, वहीं बीजेपी भी अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटी दिखाई दे रही है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा की ‘आरक्षण की समीक्षा’ की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे प्रतिनिधियों से मुलाकात ने नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है। चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर के साथ मेहमान के तौर पर विनोद अग्निहोत्री और प्रदीप सिंह मौजूद रहे।
नड्डा से रिजर्वेशन रिफॉर्म आंदोलन करने वालों से मुलाकात के मायने
कार्यक्रम में चर्चा हुई कि 21 अगस्त को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़े हर्ष दुबे, रण बहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक से जेपी नड्डा की बातचीत को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि कुछ समय पहले तक आंदोलन से जुड़े लोगों की मांग आरक्षण व्यवस्था में बड़े बदलाव और जातिगत आरक्षण की समाप्ति तक थी। हालांकि, अब आंदोलनकारी अपनी मांग को ‘आरक्षण खत्म करने’ के बजाय ‘आरक्षण में सुधार और समीक्षा’ के रूप में पेश कर रहे हैं।
इनकी प्रमुख मांगों में आर्थिक आधार पर आरक्षण, एक परिवार को एक ही बार आरक्षण का लाभ, समय-समय पर आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, EWS का दायरा बढ़ाना और आरक्षित वर्गों के भीतर उन समुदायों तक लाभ पहुंचाना शामिल है, जिन्हें अब तक अपेक्षित लाभ नहीं मिला है। चर्चा के दौरान यह तर्क भी सामने आया कि यदि आरक्षण का लाभ कुछ सीमित जातियों तक अधिक पहुंच रहा है तो वंचित समुदायों को उसका उचित हिस्सा दिलाने पर विचार होना चाहिए।
क्या BJP कर रही है ‘कोटा के भीतर कोटा’ की तैयारी?
पैनल चर्चा में इस संभावना पर भी विचार किया गया कि सरकार आरक्षण को खत्म करने की दिशा में जाने के बजाय उसमें छोटे-छोटे सुधार कर सकती है। खासकर OBC वर्ग के भीतर अधिक पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ दिलाने की मांग लंबे समय से चर्चा में रही है। इसी संदर्भ में रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का मुद्दा भी उठाया गया।
विश्लेषण में कहा गया कि अगर OBC के भीतर आरक्षण के लाभ का असमान वितरण है तो ‘कोटा के भीतर कोटा’ जैसी व्यवस्था पर चर्चा राजनीतिक रूप से ज्यादा स्वीकार्य हो सकती है। इससे उन अति पिछड़े वर्गों को साधने की कोशिश हो सकती है, जिन्हें लगता है कि आरक्षण का लाभ उन्हें पर्याप्त रूप से नहीं मिल रहा।
हालांकि, मेहमानों ने यह भी कहा कि आरक्षण जैसा संवेदनशील मुद्दा किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद जोखिम भरा है। बीजेपी के सामने एक तरफ उसका पारंपरिक सवर्ण समर्थक वर्ग है तो दूसरी तरफ OBC, दलित और अन्य आरक्षित वर्गों का बड़ा वोट बैंक है। ऐसे में पार्टी के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।
यूपी चुनाव में सामाजिक समीकरण सबसे बड़ा हथियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। चर्चा में यह बात सामने आई कि बीजेपी ने 2014 के बाद ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के जरिए अलग-अलग जातीय समूहों को अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की। सवर्ण, OBC और दलित वर्गों के अलग-अलग हिस्सों का समर्थन बीजेपी के लिए चुनावी तौर पर बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जयंत चौधरी की मुलाकात को भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल का बीजेपी के साथ गठबंधन पहले से है, लेकिन पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं के बीच उनकी राजनीतिक पकड़ को देखते हुए बीजेपी उनके साथ अपने समीकरण को मजबूत रखना चाहती है।
चर्चा में यह भी कहा गया कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच राजनीतिक दूरी का फायदा बीजेपी को मिल सकता है। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम-जाट या जाटव-मुस्लिम जैसे संभावित समीकरण चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इस क्षेत्र में हर राजनीतिक बयान का असर व्यापक हो सकता है।
पूर्वांचल में BJP के सामने बड़ी चुनौती
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ पूर्वांचल भी बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा है। यहां समाजवादी पार्टी का सामाजिक आधार मजबूत है और ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल जैसे सहयोगी नेताओं की भूमिका बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। आजमगढ़, गाजीपुर और जौनपुर जैसे इलाकों में जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं।
इसी वजह से बीजेपी अपने सहयोगी दलों और प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं को साथ रखने पर जोर दे रही है। चर्चा में यह भी कहा गया कि पूर्वांचल में पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों का समर्थन चुनावी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
कांग्रेस और रायबरेली-अमेठी पर भी BJP की नजर
यूपी की चुनावी रणनीति में कांग्रेस भी बीजेपी के रडार पर है। अमेठी में स्मृति ईरानी की सक्रियता और रायबरेली को लेकर बीजेपी नेताओं के बयानों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। स्मृति ईरानी की अमेठी में सक्रियता ने इस सवाल को भी जन्म दिया है कि क्या बीजेपी उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में कोई बड़ी भूमिका दे सकती है।
कुल मिलाकर यूपी चुनाव से पहले बीजेपी कई मोर्चों पर एक साथ काम करती दिखाई दे रही है, आरक्षण के मुद्दे पर संवाद, सवर्ण और पिछड़े वर्गों के बीच संतुलन, पश्चिमी यूपी में जाट समीकरण, पूर्वांचल में सहयोगी दलों की सक्रियता और अमेठी-रायबरेली जैसे कांग्रेस के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजनीतिक चुनौती। ऐसे में आने वाले दिनों में आरक्षण सुधार की बहस और सहयोगी दलों की सक्रियता उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। Coffee Par Kurukshetra में इससे पहले यूपी और अन्य राज्यों के सर्वे को लेकर चर्चा हुई थी, जिसमें पता चला था कि 25 फीसदी लोगों ने कहा कि वे वोट देते वक्त पार्टी की विचारधारा को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
function loadFacebookScript(){
!function (f, b, e, v, n, t, s) {
if (f.fbq)
return;
n = f.fbq = function () {
n.callMethod ? n.callMethod.apply(n, arguments) : n.queue.push(arguments);
};
if (!f._fbq)
f._fbq = n;
n.push = n;
n.loaded = !0;
n.version = ‘2.0’;
n.queue = [];
t = b.createElement(e);
t.async = !0;
t.src = v;
s = b.getElementsByTagName(e)[0];
s.parentNode.insertBefore(t, s);
}(window, document, ‘script’, ‘//connect.facebook.net/en_US/fbevents.js’);
fbq(‘init’, ‘1684841475119151’);
fbq(‘track’, “PageView”);
}
window.addEventListener(‘load’, (event) => {
setTimeout(function(){
loadFacebookScript();
}, 7000);
});













