क्वेटा8 घंटे पहले
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बलूचिस्तान में बलूच विद्रोहियों के बढ़ते हमलों से पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा बल पर दबाव बढ़ रहा है। इनसे निपटने के लिए पाकिस्तान ने 2,000 पूर्व अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों भर्ती किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें ज्यादातर वे अफगान सैनिक हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के साथ तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
एक पूर्व अफगान सैनिक के मुताबिक, भर्ती हुए लोगों को हर महीने 40 हजार पाकिस्तानी रुपए, यानी करीब 13,807 भारतीय रुपए मिलते हैं।

बलूचिस्तान में 2 महीने में 172 हमले, 68 सुरक्षाकर्मी मारे गए
बलूचिस्तान में सुरक्षा ऑपरेशन चलाए जाने के बावजूद विद्रोही थानों, सरकारी दफ्तरों और हाईवे को निशाना बना रहे हैं।
पाकिस्तान की सुरक्षा और हिंसा से जुड़े मामलों पर रिसर्च करने वाली संस्था PICSS के मुताबिक, दो महीने में बलूचिस्तान में 172 हमले हुए। अकेले जुलाई में विद्रोही हमलों और सुरक्षा ऑपरेशन के दौरान 62 सुरक्षाकर्मी मारे गए।
हालात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नौश्की शहर में विद्रोहियों से नियंत्रण वापस लेने के लिए पाकिस्तानी सेना को हेलिकॉप्टर और ड्रोन का इस्तेमाल करना पड़ा।
तालिबान की वापसी के बाद नौकरी गई, आर्थिक तंगी ने भर्ती को मजबूर किया
- अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद कई पूर्व अफगान सैनिकों की नौकरी और तनख्वाह बंद हो गई। बदले के डर से इनमें से कई पाकिस्तान चले आए।
- 2021 से 2023 के बीच पूर्व सैनिकों और सुरक्षाकर्मियों की 218 हत्याएं हुईं। ऐसे माहौल में उनके लिए अफगानिस्तान वापस जाना मुश्किल था।
- पाकिस्तान आने के बाद इन लोगों के पास कोई काम नहीं था। पैसों की दिक्कत बढ़ती गई। ऐसे में जब सुरक्षा बल में नौकरी मिली, तो उन्होंने इसे अपना लिया।
पाकिस्तान को इन सैनिकों से क्या फायदा?
इन पूर्व अफगान सैनिकों को हथियार चलाने और लड़ाई का पहले से अनुभव है। वे तालिबान के खिलाफ लड़ चुके हैं और सीमावर्ती इलाकों में काम कर चुके हैं। इसलिए उन्हें सुरक्षा से जुड़े काम समझाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
पाकिस्तान के लिए इसका एक फायदा यह भी है कि इन लोगों को पहले से सैन्य ट्रेनिंग मिली हुई है। ऐसे में नए सिरे से उन्हें बेसिक ट्रेनिंग देने की जरूरत कम पड़ सकती है।
बलूचिस्तान के 27 जिलों में विद्रोही संगठनों की गतिविधियां
पाक इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल बलूचिस्तान में 254 हमले हुए।
इनमें बलूच विद्रोही संगठनों से जुड़े 225 हमले 27 जिलों में दर्ज किए गए। केच में 30 और क्वेटा में 26 हमले हुए।
वहीं, टीटीपी से जुड़े 28 हमले दर्ज किए गए। इनकी ज्यादा गतिविधियां उत्तरी पश्तून बहुल इलाकों में हुईं।
बलूच संगठन स्वायत्तता या आजादी की मांग करते हैं, जबकि टीटीपी इस्लामी शासन लागू करना चाहता है।

बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने वाली बलूच लिबरेशन आर्मी ने मस्तंग में पाकिस्तान सेना पर हमले का दावा किया था। तस्वीर जुलाई 2026 की है।
बलूचिस्तान में दो महीने में 450 से ज्यादा मौतें

कई शहरों में पुलिस की पकड़ कमजोर
लगातार हो रहे हमलों के कारण बलूचिस्तान के कई जिलों में पुलिस की पकड़ कमजोर हुई है। इससे कानून-व्यवस्था संभालने में भी मुश्किल आ रही है।
प्रशासन को रोजमर्रा के पुलिस कामों के लिए भी अर्धसैनिक बलों और सेना की मदद लेनी पड़ रही है। कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था के लिए सैन्य बलों पर निर्भरता बढ़ गई है।
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