नई दिल्ली: चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने बुधवार को कांग्रेस पर निशाना साधा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला की नियुक्ति का जिक्र करते हुए कांग्रेस के चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोपों पर सवाल उठाए।
कांग्रेस ने चुनाव आयोग को कठपुतली बनाया
संबित पात्रा ने कहा कि मोदी सरकार ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता को मजबूत किया है, जबकि कांग्रेस ने पचास साल में चुनाव आयोग को कठपुतली बना दिया था। उन्होंने के वी के सुंदरम से लेकर नवीन चावला तक उन सभी पूर्व चुनाव आयुक्तों के नाम गिना दिए। ये भी बताया कि कांग्रेस ने रिटायरमेंट के बाद इन चुनाव आयुक्तों को कौन कौन से पद दिए। कैसे उपकृत किया। संबित पात्रा ने कहा कि हकीकत ये है कि कांग्रेस को जनता ने नकार दिया है। इसलिए अब कांग्रेस के नेता खिसियाहट में बीजेपी पर अनाप-शनाप आरोप लगाते हैं।
2009 के लोकसभा चुनावों के सीईसी थे नवीन चावला
संबित पात्रा ने दावा किया कि 2005 में नवीन चावला को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था और 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान वह मुख्य चुनाव आयुक्त थे। उन्होंने कहा कि उस चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए को जीत मिली थी। पात्रा ने इसी संदर्भ में कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच संबंधों को लेकर सवाल उठाए। पात्रा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में हुए बदलाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 2023 तक नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख थी, जबकि अब नियुक्ति से जुड़ी समिति में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को भी शामिल किया गया है।
एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद!
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। यह सब इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी एक खबर के बाद शुरू हुआ। इस खबर में चुनाव आयोग की अंदर की लड़ाई सामने आ गई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग को हाईजैक करने का आरोप लगा। इल्ज़ाम लगाने वाले उनके अपने साथी दो इलेक्शन कमिश्नर हैं। उनका आरोप है कि ज्ञानेश कुमार मनमर्ज़ी से चुनाव आयोग चलाते हैं। बाक़ी दो चुनाव आयुक्तों की सलाह नहीं सुनते। उनके फ़ैसलों की जानकारी बाक़ी दोनों Election Commissioners को media से मिलती है। इसकी शिकायत दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में चौदह बार की। कैबिनेट सचिव को चिट्ठियां लिखीं, लेकिन उन्हें कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। ये सारे दावे इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में किए गए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां किसी भी संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
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