इन दिनों उत्तराखंड के ट्रेल्स पास का एक एवलांच वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पर्वतारोहियों के बेहद करीब से बर्फ का बड़ा गुबार गुजरता दिखाई देता है। दावा किया जा रहा है कि ट्रैकिंग दल कुछ सेकेंड के अंतर से मौत के मुंह में जाने से बचा था। लेकिन आखिर उस दिन हुआ क्या था, एवलांच कब आया, टीम वहां तक पहुंची कैसे और उस वक्त पर्वतारोहियों पर क्या बीती, इसकी पूरी कहानी अब सामने आई है। दरअसल, 8 जून को 17,200 फीट ऊंचे ट्रेल्स पास को फतह करने के बाद 19 सदस्यीय पर्वतारोहण दल नंदा देवी ईस्ट बेस कैंप की ओर उतर रहा था। टीम एक खड़ी बर्फीली ढलान पर थी कि अचानक नीचे से ‘भागो-भागो’ की आवाज सुनाई दी। पर्वतारोहियों ने ऊपर देखा तो एक विशाल एवलांच उनकी ओर बढ़ रहा था। सुरक्षित जगह की ओर भागने के दौरान एक महिला ट्रैकर का पैर भी फिसल गया, लेकिन गाइड की सूझबूझ से पूरी टीम बच गई। अभियान का नेतृत्व कर रहे दिनेश सिंह दानू बताते हैं कि अगर कुछ सेकेंड की भी देरी हो जाती तो पूरा दल एवलांच की चपेट में आ सकता था। हालांकि टीम सुरक्षित बच निकली और 11 जून को मुनस्यारी पहुंच गई। दैनिक भास्कर ने इस अभियान का नेतृत्व करने वाले गाइड से बात कर उस पूरे घटनाक्रम को समझा, जो वायरल वीडियो में दिखाई नहीं देता। अब पढ़िए इस अभियान की पूरी कहानी…. 30 मई को खाती गांव से शुरू हुआ था अभियान कोलकाता के 9 सदस्यीय दल और स्थानीय गाइड स्टाफ ने 30 मई को बागेश्वर जिले के खाती गांव से ट्रेल्स पास अभियान शुरू किया था। पहले दिन टीम द्वाली पहुंची, लेकिन लगातार बारिश के कारण 31 मई को वहीं रुकना पड़ा। 1 जून को टीम पिंडारी बेस कैंप पहुंची। इसके बाद मौसम लगातार खराब बना रहा। भारी बर्फबारी और फिसलन के कारण सपोर्ट टीम तय स्थान तक नहीं पहुंच सकी। कई बार योजना बदलनी पड़ी और अभियान की गति धीमी हो गई। दो फीट बर्फ, 250 मीटर रॉक सेक्शन और लगातार बर्फीले तूफान दिनेश दानू बताते हैं कि एडवांस बेस कैंप क्षेत्र में पहले से करीब दो फीट बर्फ जमी थी। 4 जून को लगभग 250 मीटर रॉक सेक्शन पर रोप फिक्स कर टीम किसी तरह एडवांस बेस कैंप पहुंची। लेकिन वहां पहुंचते ही आठ से दस इंच ताजा बर्फ गिर गई। अगले दिन मौसम कुछ साफ दिखा तो गाइड दिनेश दानू, इंद्र सिंह और तारा सिंह आगे का रूट खोलने निकले। उन्हें ट्रेल्स पास पहुंचने से पहले करीब 200 मीटर ऊंची खड़ी रॉक वॉल पर रोप फिक्स करनी थी। इसी दौरान अचानक बर्फबारी और तेज हवाएं शुरू हो गईं। रोप फिक्सिंग के दौरान 400 मीटर लंबी रस्सी का बंडल हाथ से फिसलकर गहरी खाई में जा गिरा। एक समय ऐसा लगा कि पूरा अभियान रोकना पड़ सकता है। पतली लाइन और आइस एक्स के सहारे बचाई गई चढ़ाई रस्सी खोने के बाद टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षित वापसी की थी। लेकिन गाइड दल ने हार नहीं मानी। बर्फीले तूफान के बीच आइस एक्स और एक पतली टेंट लाइन के सहारे आगे बढ़ने का फैसला लिया गया। दिनेश दानू के मुताबिक उस रात लगभग 24 घंटे तक लगातार बर्फबारी होती रही और डेढ़ फीट तक नई बर्फ जम गई। अगले दिन टीम ने नीचे उतरकर खाई में गिरी रस्सी को खोजा, उसे दोबारा निकाला और फिर पूरी टीम को एक-एक कर ऊपर पहुंचाया। इसके बाद पर्वतारोहियों ने पिंडारी और नंदा खाट क्षेत्र के बीच फैले विशाल आइस फील्ड, ग्लेशियर और खतरनाक हिम दरारों को पार करते हुए ट्रेल्स पास की ओर बढ़ना जारी रखा। 8 जून को फतह किया ट्रेल्स पास, कुछ घंटे बाद सामने आ गया मौत का मंजर 8 जून की सुबह टीम ट्रेल्स पास पहुंची और 5,312 मीटर (करीब 17,200 फीट) ऊंचे दर्रे को सफलतापूर्वक पार कर लिया। इसके बाद दल नंदा देवी ईस्ट बेस कैंप की दिशा में उतराई शुरू कर चुका था। दिनेश दानू बताते हैं कि उतराई के दौरान उन्होंने पहाड़ की ढलान पर एक बड़ा स्लैब टूटा हुआ देखा था। इससे उन्हें हिमस्खलन का खतरा महसूस हो गया था। इसी वजह से उन्होंने पूरी टीम को सुबह जल्दी निकलने के निर्देश दिए। करीब सात बजे टीम पास क्षेत्र से नीचे उतर रही थी। अधिकांश सदस्य ढलान पार कर चुके थे। तभी नीचे मौजूद सदस्यों ने अचानक जोर-जोर से ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया। महिला ट्रैकर फिसली, गाइड ने रोका; ऊपर से टूट पड़ा एवलांच आवाज सुनकर जब टीम ने ऊपर देखा तो विशाल एवलांच तेजी से उनकी ओर बढ़ रहा था। उस समय गाइड दिनेश दानू, सुचरिता धारा, दिशा घोष, स्पंदन मलिक और कुछ अन्य सदस्य अभी भी ढलान पर मौजूद थे। भागने की कोशिश के दौरान सुचरिता धारा का पैर फिसल गया। दिनेश दानू ने तत्काल उन्हें रोका और टीम को ढलान के सुरक्षित हिस्से की ओर हटाया। कुछ ही सेकेंड बाद बर्फ का विशाल गुबार उनके बेहद करीब से गुजर गया। दल के सदस्यों के अनुसार यदि कुछ सेकेंड की भी देरी होती तो पूरा समूह एवलांच की चपेट में आ सकता था। दिनेश दानू कहते हैं- 15 साल के पर्वतारोहण जीवन में मैंने इतना चुनौतीपूर्ण अभियान पहली बार देखा। भगवान की कृपा रही कि पूरा दल सुरक्षित बच गया। क्या है ट्रेल्स पास, जिसे उत्तराखंड का सबसे कठिन ट्रैक माना जाता है ट्रेल्स पास उत्तराखंड के बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों को जोड़ने वाला हिमालयी दर्रा है। यह पिंडारी ग्लेशियर क्षेत्र को जोहार घाटी और मुनस्यारी से जोड़ता है। इसका नाम ब्रिटिश काल के कुमाऊं कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल के नाम पर पड़ा था। स्थानीय इतिहास के अनुसार सुपी गांव के मालक सिंह बूढ़ा इस दुर्गम दर्रे को पार करने वाले शुरुआती लोगों में शामिल थे। आज ट्रेल्स पास को उत्तराखंड के सबसे कठिन और जोखिमभरे ट्रैकिंग रूट्स में गिना जाता है। —————— ये खबर भी पढ़ें…. गंगा नदी में बोतलें ठंडी कर पी शराब; VIDEO:ऋषिकेश के तपोवन क्षेत्र में युवकों की दारू पार्टी, स्थानीय लोगों ने कहा- शर्मनाक ऋषिकेश के तपोवन क्षेत्र में युवकों की दारू पार्टी का एक वीडियो सामने आया है। इसमें युवक गंगा नदी में शराब की बोतलें ठंडी करते दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं में खासी नाराजगी है। (पढ़ें पूरी खबर)
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उत्तराखंड के ट्रेल पास एवलांच की पूरी कहानी:'भागो-भागो' चिल्लाने पर फिसली महिला ट्रैकर, गाइड ने एक पैर से बचाई जान | ACTPnews

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