दो हज़ार रुपये से ज़्यादा की UPI लेनदेन के नियमों को लेकर जम कर सियासत शुरू हो गई है। आज विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर अपने वीडियो में मांग की कि इस फैसले को तुरंत वापिस लिया जाय। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि अमेरिकी कंपनियों के दबाव में आकर UPI tax लगाया जा रहा है। दरअसल, सरकार कल ही स्पष्ट कर चुकी थी कि person-to-person UPI लेनदेन पर कोई चार्ज नहीं लगेगा। केवल person-to-business और business-to-business लेनदेन पर 0.4 परसेंट merchant discount charge लगेगा, वो भी 2,000 रु. से ज्यादा की लेनदेन पर। 75 हजार रुपये से ज्यादा की लेनदेन पर अधिकतम 300 रु. चार्ज लगेगा। ये पैसा आम आदमी को नहीं देना पड़ेगा।
पिछले दो दिनों से ये गलतफहमियां फैलाई जा रही थी कि सरकार के फ़ैसले से digital transaction कम हो जाएंगे, अब फिर से cash का चलन बढ़ जाएगा। जो लोग cash की जगह UPI payment करते हैं, उन्हें नुक़सान होगा। छोटे दुकानदार और रेहड़ी पटरी वालों का बोझ बढ़ेगा लेकिन सरकार ने कहा कि ये सारी बातें बेबुनियाद हैं।
UPI अबतक फ्री था। इस पर चार्ज क्यों लगा, ये समझने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि UPI है कितना विशाल ?
UPI से हर रोज़ 79 करोड़ transactions होते हैं। हर मिनट 5 लाख 49 हज़ार transactions UPI से होते हैं। ये दुनिया का सबसे बड़ा digital platform है। पिछले साल 24 हज़ार करोड़ transactions हुए जिसमें 314 लाख करोड़ रुपये की लेनदेन हुई। अब इतना बड़ा सिस्टम चलाने में ख़र्चा तो होता है। इस साल UPI digital platform को मैनेज करने में 20 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च होंगे। पिछले 10 साल में ये सारा ख़र्चा सरकार ने उठाया।
अब पहली बार इस ख़र्चे को recover करने के लिए fees लगाई गई। लेकिन इस बात को सरकार समझती है कि UPI में बड़ी संख्या में आम आदमी लेनदेन करते हैं। इसलिए UPI को use करने वाले 94% लोगों को कोई charge नहीं देना पड़ेगा। जहां charge लगेगा, वहां merchant उसका बोझ आम आदमी पर transfer न करे, ये सुनिश्चित किया गया है। ज़्यादातर लोगों के लिए UPI अभी भी free रहेगा। हालांकि मुझे लगता है कि merchant कोई ना कोई तरीक़ा निकालेंगे कि charge को आम आदमी पर ट्रांसफर करे। इसलिए कुछ दिन तक इस पूरे सिस्टम पर निगरानी रखनी चाहिए। अगर ज़रूरत पड़े तो इसकी समीक्षा करनी चाहिए। ये सुनिश्चित करना चाहिए कि UPI दुनिया का सबसे बड़ा digital platform बना रहे और भारत में कभी cash का ज़माना न लौट पाए।
क्या उत्तर प्रदेश में UCC लागू होगा?
बीजेपी अगले विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में Uniform Civil Code लागू करने की तैयारी कर रही है। योगी सरकार के सीनियर मंत्री भूपेन्द्र चौधरी ने ऐलान कर दिया कि यूपी में UCC बिल जल्दी ही विधानसभा में पेश किया जाएगा। एक दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने एलान किया था कि 2029 से पहले सभी बीजेपी शासित राज्यों में UCC लागू हो जाएगा।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने social media पर post लिखी। कहा, ये UCC नहीं, Underground Communal Conspiracy है। यूपी के तमाम मौलानाओं ने भी बीजेपी के ऐलान का विरोध किया। दारुल उलूम के प्रवक्ता मौलाना सूफियान निजामी ने कहा कि इस देश में हर मज़हब के लोग अपने रीति-रिवाजों के हिसाब से जीते हैं, सबके अपने अपने personal law हैं इसलिए UCC की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन बीजेपी चुनाव से पहले वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इस तरह के मुद्दों को हवा देती है।
अभी सिर्फ़ उत्तराखंड में UCC लागू हुआ है। गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभा में UCC बिल पास हो चुका है। राजस्थान की भजनलाल सरकार विधानसभा में बिल ला चुकी है। अब बंगाल में भी UCC बिल को लाने की तैयारी है। शुभेंदु अधिकारी विधानसभा में इसका ऐलान कर चुके हैं। महाराष्ट्र में NDA सरकार है। वहां देवेंद्र फडणवीस सरकार UCC bill के draft पर काम कर रही है। एकनाथ शिन्दे के सहयोग से सरकार UCC बिल पास करा लेगी लेकिन बिहार में इस मुद्दे पर बीजेपी की राह आसान नहीं है।
बिहार में JDU के दो विधायकों ने UCC का खुलकर विरोध किया था। उपमुख्यमंत्री और JDU के नेता विजय चौधरी ने कहा, UCC पर अभी ज़्यादा हो-हल्ला करने की ज़रूरत नहीं है, केंद्र सरकार जब भी इस तरह का प्रस्ताव लाएगी। उस वक़्त बीजेपी से बात होगी। जब सारी आशंकाएं दूर हो जाएंगी, तब JDU अपना रुख़ तय करेगा।
UCC के बारे में ये अवधारणा बनाई गई है कि ये क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ़ है। अगर पूरे देश में Uniform Civil Code होगा तो ये मुसलमानों के मज़हबी मामलों में दखल होगा। इसका विरोध वे पार्टियां कर रही हैं, जिन्हें मुस्लिम वोटों की ज़रूरत है। बीजेपी में तो UCC लागू करने के बारे में कोई असमंजस नहीं है लेकिन पिछले 12 साल में देश की राजनीति जिस तरह से बदली है उसके कारण वे नेता, जो मुसलमानों की हिमायत करते हैं, जिन्होंने शाह बानो का फ़ैसला पलटने का समर्थन किया, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिरने पर हायतौबा मचाई, जिन्होंने राम मंदिर का विरोध किया, वे नेता भी अब खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण की बात नहीं करते। इसलिए वे खुलकर UCC का विरोध करने से कतराएंगे। ऐसी हालत में असदुद्दीन ओवैसी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खुलकर UCC का विरोध कर रहे हैं। राजनीति के लिहाज़ से ये बीजेपी को suit करता है। यूपी में चुनाव होने वाले हैं और लगता तो है कि इस क़ानून को यूपी में लागू कर दिया जाएगा।
शुभेंदु ने बंगाल में माहौल कैसे बदला?
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने मृत पीए की मां हासीरानी रथ को नंदीग्राम में उम्मीदवार बनाया है, जबकि मुर्शिदाबाद के रेजीनगर में शाखारव सरकार को मैदान में उतारा है। जिस दिन शुभेंदु को बीजेपी विधायक दल का नेता चुना गया था उसी दिन कोलकाता के पास उनके पीए चन्द्रनाथ रथ की हत्या कर दी गई थी। शुभेंदु ने दावा किया है कि इस बार नंदीग्राम में बीजेपी की जीत का अंतर 50 हजार से ज्यादा वोटों का होगा।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा, नंदीग्राम में तो पहले ही भगवा लहरा चुका है, इस बार रेजीनगर में भी सनातन की ताकत दिखाई देगी। आजकल शुभेंदु अधिकारी पूरी तरह भगवा के रंग में रंगे दिख रहे हैं। दुर्गा पूजा से पहले बंगाल में गणेश उत्सव का बड़े पैमाने पर आयोजन करवा रहे हैं।
इसमें तो कोई शक नहीं है कि शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल में माहौल बदल दिया है। वह खुल कर सनातन की बात करते हैं, खुद भगवा वस्त्र पहन कर, हाथ में भगवा झंडा लेकर सड़कों पर निकलते हैं, विधानसभा में खड़े होकर कहते हैं कि बंगाल में सबका स्वागत है, हर मजहब का सम्मान है। साथ में ये भी कहते है कि अब बंगाल में सनातन का अपमान करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। शुभेंदु अधिकारी की ये साफगोई बंगाल के लोगों को पंसद आ रही हैं क्योंकि पिछले पचास साल से बंगाल में तुष्टीकरण की राजनीति के चक्कर में हिन्दुओं को दबाया गया। पहले वामपंथियों ने ये काम किया। इसके बाद 27% मुस्लिम वोटों के चक्कर में ममता बनर्जी ने भी तुष्टीकरण का रास्ता अपनाया और अब इसका फायदा बीजेपी को मिल रहा है।
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