‘लव लॉटरी’- मूवी रिव्यू:प्यार किया, शादी की और फिर पत्नी के कत्ल का इल्जाम पति पर; आखिर असली कातिल कौन है? | ACTPnews

‘लव लॉटरी’- मूवी रिव्यू:प्यार किया, शादी की और फिर पत्नी के कत्ल का इल्जाम पति पर; आखिर असली कातिल कौन है?

प्यार हुआ, शादी हुई और फिर बीवी का कत्ल! मामला जब कोर्ट पहुंचता है तो पति खुद कटघरे में खड़ा है। अब वह कातिल है या कहानी का सबसे बड़ा शिकार? ‘लव लॉटरी’ इसी सवाल को लेकर अपना खेल शुरू करती है। फिल्म की कहानी कैसी है कार्तिक सक्सेना (अक्षय ओबेरॉय) की जिंदगी में भरनी वर्मा (हेली दारूवाला) आती है। मुलाकात प्यार में बदलती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन शादी के बाद वही रिश्ता धीरे-धीरे उलझने लगता है। भरोसा कम होता है, तनाव बढ़ता है और दोनों के बीच दूरियां आ जाती हैं। फिर एक दिन भरनी की हत्या हो जाती है। पुलिस की नजर सीधे कार्तिक पर जाती है और इंस्पेक्टर विक्रम बिष्ट (कबीर दूहन सिंह) उसे गिरफ्तार कर लेते हैं। कार्तिक खुद को बेगुनाह बताता है, लेकिन उसके खिलाफ हालात कम नहीं होते। इसके बाद वह अपने वकील प्रशांत बत्रा (विक्रम शर्मा) के सामने अपनी शादी की पूरी कहानी बताता है। पहली मुलाकात से लेकर प्यार, शादी और रिश्ते में आई दरार तक। फिल्म की दिलचस्पी यहीं है जितना कार्तिक अपनी कहानी बताता है, उतना ही शक बढ़ता जाता है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है अक्षय ओबेरॉय फिल्म की असली ताकत हैं। कार्तिक के किरदार में डर भी है, गुस्सा भी और खुद को बचाने की बेचैनी भी। अक्षय इन भावनाओं को बिना ज्यादा शोर किए निभाते हैं। कई सीन में वह इतने सामान्य दिखते हैं कि इसी वजह से उन पर शक और बढ़ जाता है। क्लाइमैक्स का उनका मोनोलॉग भी असर छोड़ता है। हेली दारूवाला भरनी के किरदार में जरूरी रहस्य बनाए रखती हैं। वह पूरी फिल्म में आसानी से पढ़ी नहीं जातीं, जो इस किरदार के लिए जरूरी है। कबीर दूहन सिंह पुलिस अधिकारी के रोल में फिट हैं। विजयंत कोहली कहानी में हल्कापन लाते हैं, हालांकि शादी और महिलाओं पर उनके किरदार की कुछ बातें जरूरत से ज्यादा सीधी लगती हैं। अग्नि अग्यारी और विक्रम शर्मा भी अपनी भूमिकाओं में असर छोड़ते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है अरविंद पांडेय ने गंभीर मुद्दे को सीधे भाषण में बदलने के बजाय मर्डर मिस्ट्री और कोर्टरूम ड्रामा के रास्ते पेश किया है। फिल्म का पहला हाफ इसी वजह से ज्यादा मजेदार है। रिश्ता टूट रहा है और साथ ही हत्या की गुत्थी भी उलझ रही है। हर थोड़ी देर में कोई नई बात सामने आती है और शक की सुई घूमती रहती है। लेकिन दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी धीमी पड़ती है। कोर्टरूम वाले हिस्से में कुछ ट्विस्ट उतना असर नहीं छोड़ते और कुछ बातें किरदारों के अनुभव के बजाय सीधे संवादों से समझाई जाती हैं। यही जगह फिल्म को और बेहतर बनाया जा सकता था। फिल्म पुरुष के नजरिए से वैवाहिक विवाद और भावनात्मक दबाव की बात करती है। विषय नया नहीं है, लेकिन इसे मर्डर मिस्ट्री के साथ जोड़ना दिलचस्प है। दिक्कत यह है कि कुछ जगह बहस बारीक रहने के बजाय बहुत सीधी हो जाती है। नवीन वी. मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के गंभीर माहौल को सूट करती है। उत्तराखंड की लोकेशंस खूबसूरत हैं। प्रकाश झा की एडिटिंग पहले हाफ को रफ्तार देती है, लेकिन 2 घंटे 21 मिनट की फिल्म के दूसरे हिस्से में थोड़ी कैंची और चलती तो मजा बढ़ता। फिल्म के तकनीकी क्रेडिट्स में यही सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग दर्ज हैं। फिल्म का म्यूजिक कैसा है अरविंद पांडेय और वरुण मिश्रा का संगीत कहानी के इमोशनल हिस्से को सपोर्ट करता है। ‘नजर लग जाएगी’ और ‘बेवफा’ रिश्ते में आए प्यार और टूटन को आगे बढ़ाते हैं। गाने फिल्म पर भारी नहीं पड़ते, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि फिल्म खत्म होने के बाद सबसे पहले यही याद आएं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘लव लॉटरी’ का पहला हाफ बाजी मारता है। प्यार से शुरू हुई कहानी जब हत्या तक पहुंचती है तो फिल्म पकड़ बना लेती है। अक्षय ओबेरॉय इस पकड़ को अपने अभिनय से और मजबूत करते हैं। दूसरे हाफ में वही कसाव नहीं रह जाता। कोर्टरूम ड्रामा थोड़ा खिंचता है और जेंडर से जुड़ी बहस भी कुछ जगह ज्यादा सीधे तरीके से रखी गई है। फिर भी फिल्म में इतना सस्पेंस है कि आप अंत तक यह जानना चाहेंगे कि कातिल कौन है और कार्तिक की कहानी में कितना सच है। जैकपॉट नहीं, लेकिन ‘लव लॉटरी’ की टिकट पूरी तरह घाटे का सौदा भी नहीं है।



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