वॉशिंगटन: क्या नेपाल जैसी आपदाएं और तबाही दुनिया को दशकों तक झेलनी होगी? संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट से तो ऐसा ही लगता है। जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर इस नई रिपोर्ट ने दुनिया को बड़ी चेतावनी दी है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की रिपोर्ट के मुताबिक धरती आने वाले कुछ वर्षों में 1.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग की सुरक्षित सीमा को पार कर जाएगी। इसका मतलब है कि दुनिया को आने वाले कई दशकों तक मौसम संबंधी आपदाओं, समुद्र के बढ़ते जलस्तर, प्रजातियों के विलुप्त होने और बर्फ तथा ग्लेशियरों के पिघलने जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
UNEP की यह रिपोर्ट 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के उस टारगेट के संदर्भ में सामने आई है, जिसमें वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया था। वैज्ञानिकों के मुताबिक दुनिया पहले ही लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है।
कुछ वर्षों में पार होगी 1.5°C की सीमा
इस रिपोर्ट में पहली बार UN ने स्पष्ट रूप से माना है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को बनाए रखना अब संभव नहीं दिख रहा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिशें खत्म कर दी जाएं। वैज्ञानिकों और UN के अधिकारियों का कहना है कि तापमान को पहले सीमित लेवल तक बढ़ने देना और फिर उसे धीरे-धीरे नीचे लाना अब नई रणनीति होनी चाहिए।
UNEP के मुताबिक वैश्विक तापमान इस सदी के मध्य के आसपास लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। वहीं मौजूदा नीतियों के आधार पर वर्ष 2100 तक तापमान वृद्धि करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है।
दशकों तक झेलना होगा गर्म दुनिया का असर
वैज्ञानिकों के मुताबिक 1.5 डिग्री की सीमा पार होने के बाद दुनिया को कई दशकों तक ज्यादा गर्म वातावरण में रहना पड़ सकता है। इस दौरान अत्यधिक गर्मी, बाढ़, सूखा और अन्य मौसम संबंधी आपदाएं बढ़ सकती हैं। वहीं अनाज उत्पादन प्रभावित होने, पानी की कमी बढ़ने और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने की भी आशंका है।
UNEP के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर आबादी पर पड़ेगा। कुछ स्थानों पर परिस्थितियां इतनी खराब हो सकती हैं कि वे रहने या बीमा कराने के लिहाज से बेहद मुश्किल हो जाएं।
ग्लेशियर और समुद्र के बढ़ते खतरे की चिंता
रिपोर्ट में कई चेतावनी दी गई है। इनमें पश्चिम अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों का नुकसान, अमेजन वर्षावन में बड़े पैमाने पर बदलाव जैसे खतरे शामिल हैं। जलवायु वैज्ञानिकों ने कहा है कि हर अतिरिक्त दशमलव डिग्री तापमान वृद्धि से नुकसान बढ़ेगा। इसलिए 1.5 डिग्री की सीमा पार होने के बाद भी उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना जरूरी है।
कार्बन हटाने पर जोर
रिपोर्ट में कहा गया है कि जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल खत्म करने के साथ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीकों पर भी काम करना होगा। पेड़ लगाना इसका पारंपरिक तरीका है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अकेले वनीकरण से तापमान में बहुत सीमित कमी लाई जा सकती है। ऐसे में कार्बन हटाने के नए तरीकों की जरूरत होगी।
बता दें कि नेपाल में 26 अगस्त को आए सैलाब में अब तक 1 हजार से ज्यादा लोगों के मौत की पुष्टि हो चुकी है। जान बचाने के लिए 20 हजार जवान और 20 से ज्यादा हेलीकॉप्टर्स ऑपरेशन में लगे हुए है। नेपाल की फौज के साथ इंडियन आर्मी के जवान भी जुटे हुए हैं। लेकिन अब भी 5 हजार से ज्यादा लोग नेपाल में लापता हैं।
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