Iran Hormuz Strait Conflict | Trump Claims New US Territory Statement | ACTPnews

Iran Hormuz Strait Conflict | Trump Claims New US Territory Statement


वॉशिंगटन डीसी5 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए सोशल मीडिया पर मैप पोस्ट किया है।

ट्रम्प के पोस्ट के बाद ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का हिस्सा बताना सिर्फ एक गलतफहमी है।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ट्रम्प को जल्द ही समझ आ जाएगा कि इस समुद्री रास्ते पर अमेरिका का कोई अधिकार नहीं है।

ट्रम्प ने मैप में क्या दिखाया?

ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर एक ग्राफिक पोस्ट किया, जिसके ऊपर ‘नया अमेरिकी क्षेत्र’ लिखा था। इस मैप में होर्मुज स्ट्रेट और उसके आसपास का समुद्री इलाका दिखाया गया था। इसमें ईरान, ओमान और UAE के हिस्से भी नजर आ रहे थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर यह मैप शेयर किया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर यह मैप शेयर किया।

ट्रम्प के कहने होर्मुज अमेरिका का हिस्सा हो जाएगा?

सीधा जवाब है- नहीं। होर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ता है। इस रास्ते से दुनिया के कई देशों के तेल और गैस से भरे जहाज गुजरते हैं। इसलिए इस पर सिर्फ किसी एक देश का अधिकार नहीं होता।

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी देशों के जहाजों को इस रास्ते से आने-जाने का अधिकार है। इसी वजह से कोई भी देश सिर्फ अपने दम पर इस समुद्री मार्ग पर कब्जे का दावा नहीं कर सकता।

इसलिए ट्रम्प का मैप एक राजनीतिक दावा या मैसेज माना जा सकता है, लेकिन इससे अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट पर अपने आप कोई नया कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।

होर्मुज स्ट्रेट पर किसका अधिकार है?

होर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित एक अहम समुद्री रास्ता है। इसका उत्तरी हिस्सा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी हिस्सा ओमान के मुसंदम क्षेत्र से लगता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले जहाज इसी रास्ते से अरब सागर और फिर हिंद महासागर की ओर जाते हैं।

इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक देश का नहीं, बल्कि कई देशों के लिए अहम समुद्री मार्ग है। अमेरिका यहां अपने युद्धपोत और नौसैनिक बल तैनात रखता है ताकि समुद्री व्यापार और अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। लेकिन इससे होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का मालिकाना हक नहीं हो जाता। इस समुद्री मार्ग की कानूनी स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून से तय होती है, किसी देश के दावे या सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं।

होर्मुज स्ट्रेट इतना अहम क्यों है?

होर्मुज स्ट्रेट इस समय अमेरिका और ईरान के बीच टकराव का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। खाड़ी देशों से दुनिया को भेजे जाने वाले करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति इसी समुद्री रास्ते से होती है।

फरवरी में जंग शुरू होने से पहले हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इस मार्ग से होकर गुजरता था। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की एनर्जी सप्लाई काफी हद तक इसी रास्ते पर निर्भर है।

इसी वजह से अमेरिका चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही जल्द से जल्द सामान्य हो। दूसरी ओर, ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता और समझौते में किए गए वादे पूरे नहीं करता, तब तक यह रास्ता नहीं खोला जाएगा।

ईरानी मंत्री ने ट्रम्प को पुराने बयान की याद दिलाई

गरीबाबादी ने ट्रम्प को उनके पुराने बयान की भी याद दिलाई। दरअसल, कुछ महीने पहले ट्रम्प ने ‘फारस की खाड़ी’ का नाम बदलकर ‘अरब की खाड़ी’ कहने का सुझाव दिया था। इस पर ईरान ने कड़ी आपत्ति जताई थी और कहा था कि यह नाम सदियों से ‘फारस की खाड़ी’ ही है।

अब ट्रम्प ने अपने पोस्ट में ‘फारस की खाड़ी’ शब्द का इस्तेमाल किया। इस पर तंज कसते हुए गरीबाबादी ने कहा कि जब ट्रम्प ने इस बार सही नाम का इस्तेमाल किया है, तो उम्मीद है कि उन्हें यह भी समझ आ जाएगा कि होर्मुज स्ट्रेट अमेरिका का इलाका नहीं है।

ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल (2017) में ईरान पर भाषण देते हुए पहली बार फारस की खाड़ी को अरब की खाड़ी कहा था। ईरान में इसे राष्ट्रीय पहचान का मुद्दा माना जाता है, इसलिए इस पर बहुत विवाद हुआ था।

70 साल पहले ‘फारस की खाड़ी’ नाम को लेकर विवाद शुरू

ईरान और सऊदी के बीच की खाड़ी को ढाई हजार साल से भी ज्यादा समय से ‘फारस की खाड़ी’ के नाम से जाना जाता है। प्राचीन यूनानी खगोलशास्त्री टॉलेमी के लेखों में इसका जिक्र मिलता है। रोमन साम्राज्य, अरब इतिहासकारों के लेखों और यूरोपीय नक्शों में भी सदियों तक यही नाम इस्तेमाल होता रहा।

1950 के दशक में यह नाम विवाद का विषय बन गया। 1955 में बहरीन में ब्रिटिश सलाहकार सर चार्ल्स बेलग्रेव ने पहली बार अपने लेखों में ‘अरबियन गल्फ’ (अरब की खाड़ी) शब्द का इस्तेमाल किया।

1960 के दशक में अरब राष्ट्रवाद (पैन-अरबिज्म) के उभार के साथ यह विवाद और बढ़ गया। मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर और कई अरब देशों ने राजनीतिक और सांस्कृतिक कारणों से ‘फारस की खाड़ी’ की जगह ‘अरबियन गल्फ’ कहना शुरू कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले कई अरब देशों के सरकारी दस्तावेजों, स्कूलों की किताबों और नक्शों में भी ‘फारस की खाड़ी’ ही लिखा जाता था।

1970 के दशक के बाद सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, बहरीन, कतर में ‘अरबियन गल्फ’ का इस्तेमाल आम हो गया। ईरान तब से इसका विरोध कर रहा है। ईरान का कहना है कि यह नाम इतिहास और अंतरराष्ट्रीय मानकों के खिलाफ है।

UN बोला अरब की खाड़ी नाम सही नहीं

संयुक्त राष्ट्र समेत ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आज भी इसी नाम को आधिकारिक मानती हैं। 2002 में संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि अरब की खाड़ी नाम सही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय जल सर्वेक्षण संगठन (IHO) और दुनिया के अधिकांश एटलस व मानचित्र भी इसी नाम को मान्यता देते हैं।

यह विवाद 2017 में फिर सुर्खियों में आया, जब डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर अपनी नीति का ऐलान करते हुए पहली बार ‘फारस की खाड़ी’ की जगह ‘अरब की खाड़ी’शब्द का इस्तेमाल किया।

ईरान में इसे राष्ट्रीय पहचान का मुद्दा माना जाता है, इसलिए इस पर बहुत विवाद हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ट्रम्प से कहा था कि उन्हें भूगोल का अध्ययन करना चाहिए।

—————————-

यह खबर भी पढ़ें…

ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Search the Archives

Access over the years of investigative journalism and breaking reports