पानीपत2 घंटे पहलेलेखक: अमन वर्मा
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नीरज चोपड़ा ने अपने थ्रो में 85.83 मीटर दूर भाला फेंका, जिसके बाद उनके चाचा समेत परिजन और ग्रामीण ताली बजाने लगे।
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स की पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा के फाइनल मुकाबले में भारत के स्टार एथलीट नीरज चोपड़ा ने देश के लिए सिल्वर मेडल जीता है। नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में 85.83 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए पदक तालिका में दूसरा स्थान प्राप्त किया। इस कड़े मुकाबले में श्रीलंका के रुमेश पथिराजे ने 89.75 मीटर के थ्रो के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया, जबकि पाकिस्तान के ओलंपिक चैंपियन अरशद नदीम तीन थ्रो के बाद ही प्रतियोगिता से बाहर हो गए।
जैसे ही नीरज मेडल विनर बने, पानीपत के गांव खंडरा में उनके घर खुशियां मनाई गई। दैनिक भास्कर एप से फोन पर बातचीत के दौरान नीरज चोपड़ा के पिता सतीश चोपड़ा ने कहा कि बेटे ने एक बार फिर देश की झोली में मेडल डाला, इसकी बेहद ज्यादा खुशी है, लेकिन उम्मीद गोल्ड मेडल की थी। उन्होंने बेटे के गोल्ड मेडल से चूकने दो मुख्य वजहें बताई। इनमें पहली वजह वहां का तेज हवा वाला ठंडा मौसम रहा। उन्होंने कहा-
तेज हवा के कारण जिस खिलाड़ी ने अपना पहला जो भी बेस्ट थ्रो किया, इसके बाद उससे आगे कोई नहीं जा सका। सभी पिछड़ते ही रहे। दूसरा कारण बीते दिनों नीरज को जो चोट लगी थी, वो भी कारण रहा है। मगर, हर बड़े मुकाबले में हर खिलाड़ी पर प्रेशर रहता ही है। इसके बावजूद बेटे को सिल्वर मेडल मिला, इसकी हमें बहुत खुशी है।

उधर, इवेंट के बाद नीरज ने भी मीडिया से हुई बातचीत में वेदर कंडीशंस और इंजरी का जिक्र किया। कहा कि वेदर स्टार्टिंग में थोड़ा ठीक था, बाद में काफी ठंड और हवा चलने लग गई थी। चौथे थ्रो के बाद नीरज खुद के प्रदर्शन से काफी असंतुष्ट भी दिखे थे।
नीरज का मैच देखते उनके परिवार के PHOTOS…

नीरज के पहले थ्रो के बाद ताली बजाते हुए चाचा भीम चोपड़ा व साथ में बैठे ग्रामीण।

सिल्वर मेडल की घोषणा होने के बाद घर पर मुकाबला देख रहे लोगों ने तालिया बजाई।
फाइनल में उतार-चढ़ाव वाला रहा नीरज का प्रदर्शन
फाइनल मुकाबले के दौरान नीरज चोपड़ा का प्रदर्शन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। उनके पहले प्रयास में 80.97 मीटर, दूसरे प्रयास में 85.83 मीटर, तीसरे प्रयास में 81.29 मीटर और चौथे प्रयास में 80.73 मीटर दूर भाला फेंका। अपने चौथे थ्रो के बाद नीरज खुद के प्रदर्शन से काफी असंतुष्ट दिखे। वहीं, पांचवें और छठे प्रयास में भाला 80 मीटर से कम दूरी पर गिरता देख उन्होंने अपने थ्रो रद्द कर दिए। दूसरे प्रयास में 85.83 मीटर के थ्रो के आधार पर उन्होंने सिल्वर मेडल जीता।
हरियाणा के ही यशवीर सिंह ने ब्रॉन्ज मेडल जीता
नीरज चोपड़ा के साथ ब्रांज मेडल जीतने वाले यशवीर सिंह भी हरियाणा के रहने वाले हैं। उनका जन्म 22 अक्टूबर 2001 को भिवानी जिले के देवसर गांव में हुआ था। यशवीर सिंह के पिता का नाम राय सिंह है, जो खुद नेशनल लेवल के जैवलिन थ्रोअर, रेलवे चैंपियन और रेलवे के रिटायर्ड कोच रहे हैं। उनके दादा और चाचा भी एथलेटिक्स (हर्डल रेस) में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके थे।
उनका छोटा भाई उत्सव भी U-18 का जैवलिन थ्रोअर है। यशवीर सिंह जिस जिले से आते हैं, उसे मिनी क्यूबा कहा जाता है और यह बॉक्सिंग के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यशवीर के गांव देवसर से जितेंद्र सिंह और मनीष कौशिक जैसे ओलंपियन मुक्केबाज निकले हैं, लेकिन यशवीर के परिवार का रुझान हमेशा एथलेटिक्स की तरफ रहा।

नीरज ने अपना पहला थ्रो 80.97 मीटर का किया था।
मेडल जीतने के बाद नीरज चोपड़ा ने मीडिया से कही ये बातें…
सवाल: यशवीर के साथ मेडल जीतने के बाद कैसा लग रहा है?
नीरज चोपड़ा : बहुत अच्छा लगा। Asian Games में भी देवेंद्र भाई और मैंने मेडल जीता था। काफी खुशी है कि यशवीर (ब्रांज जीतने वाले) ने इस सीज़न का अपना पर्सनल बेस्ट किया, ये बहुत ज़रूरी था। बहुत अच्छा लग रहा है कि हम पॉडियम पर हैं।
सवाल : आपका का कमबैक कैसा रहा?
नीरज चोपड़ा : बिल्कुल, हमेशा मन तो रहता ही है कि नेशनल एंथम बजे, पर ठीक है, मैंने भी इस सीज़न अपना बेस्ट किया है। कमबैक ठीक रहा। अभी बाकी कॉम्पिटिशन्स भी हैं, तो काफी खुशी है आज।”
सवाल : क्या मौसम ने परेशान किया?
नीरज चोपड़ा : वेदर कल से थोड़ा बेटर था। स्टार्टिंग में थोड़ा ठीक था, बाद में काफी ठंड और हवा चलने लग गई थी। मुझे भी लग रहा है कि मैं थोड़ा और खींच सकता था। (हंसते हुए) ठंड में मैं इतना अच्छा नहीं कर पाता, मुझे थोड़ा गर्मी पसंद है। इंडियन खून है ना…”।

इवेंट के बाद मीडिया से बातचीत करते नीरज चोपड़ा।
सवाल: श्रीलंकाई एथलीट के थ्रो पर क्या कहेंगे?
नीरज चोपड़ा : उसका एक ही बेस्ट रहा… मेरा भी एक ही रहा। मुझे लग रहा था कि अच्छा जाएगा, पर वो फ्लाई नहीं किया जेवलिन ने। काफी अच्छा थ्रो किया रुमेश ने, 89 समथिंग था। अच्छा थ्रो था।
सवाल: गोल्ड कोस्ट से अब तक का सफर कैसा रहा?
नीरज चोपड़ा: सफ़र तो लंबा है, 8 साल की बात हो गई है। गोल्ड जीता था गोल्ड कोस्ट में… तो वो तो अलग ही बात है। यह भी काफी समय बाद पॉडियम पर हैं कंट्री के लिए”।
सवाल: फिटेनस को लेकर कोई इश्यू है?
नीरज चोपड़ा: फिटनेस पूरी तरह नहीं बोल सकता कि पहले जैसी है, अभी धीरे-धीरे आ रहे हैं उसमें। जैसे मैंने बताया था कि दो हफ़्ते पहले मेरा पहला कॉम्पिटिशन था। यहां पर थोड़ा बेटर था। बाकी के जो कॉम्पिटिशन्स बचे हैं, अभी रिदम पकड़ रहे हैं धीरे-धीरे। शायद दो महीने बाद है..। उससे पहले अभी डायमंड लीग वगैरह भी है, उसमें भी पार्टिसिपेट करेंगे।”
सवाल : नीरज मतलब गोल्ड, इवेंट से पहले प्रेशर था?
नीरज चोपड़ा: नहीं, प्रेशर तो क्या है… बस यह है कि अगर 100% फिट हो तो फिर वो फाइटिंग स्पिरिट ज़्यादा रहती है। मतलब यह लगता है कि अब कुछ भी कर सकते हैं। और अगर मतलब आप इंजरी से आ रहे हैं तो थोड़ा सा सोच-सोच के कदम रखना पड़ता है। तो आज वही था कि थोड़ा… मन में डर था। कभी सोच रहा था कि थोड़ा जोर से मैं भागूं, और कभी लग रहा था कि थोड़ा कंट्रोल में रखूं। वही थोड़ा मिक्स फीलिंग्स थीं और… फिर भी चलो ठीक था।

चाचा भीम चोपड़ा ने कहा कि जेवलिन में आने वाले समय में भारत का दबदबा नजर आएगा।
चाचा भीम बोले- आने वाले समय में ज्वेलिन पर भारत का होगा दबदबा
भतीजे नीरज चोपड़ा के सिल्वर मेडल जीतने के बाद चाचा भीम चोपड़ा ने कहा कि उन्हें इस मेडल की भी बहुत खुशी है। भारत की झोली में दो पदक आए, इससे खुशी और ज्यादा बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि अब भारत में 80-85 मीटर तक भाला फेंकने वाले कई खिलाड़ी सामने आ गए हैं। इससे भविष्य की तस्वीर साफ है। जिस तरह पहले फिनलैंड का ज्वेलिन पर दबदबा होता था, आने वाले समय में भारत का दबदबा नजर आएगा।

नीरज के दादा शनिवार की सुबह लड्डू खाते हुए।
दूसरे थ्रो पर बजीं तालियां, परिजनों ने कराया मुंह मीठा
जब नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में 85.83 मीटर का थ्रो किया, तो पूरे घर में तालियों की गूंज सुनाई दी और सभी चेहरे खिल उठे। सिल्वर मेडल पक्का होते ही देर रात घर पर मौजूद परिजनों और ग्रामीणों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा करवाकर नीरज की इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर की और एक बार फिर देश का नाम रोशन करने के लिए उन्हें बधाई दी।
नीरज के चाचा भीम चोपड़ा ने ग्रामीणों के साथ घर के वेटिंग एरिया में बैठकर पूरे मैच का आनंद लिया। हालांकि, उनके पिता सतीश चोपड़ा और दादा धर्म सिंह चोपड़ा इस बार मौजूद नहीं थे। मगर, शनिवार की सुबह वे गांव पहुंच गए, जिसके बाद ग्रामीणों ने लड्डू खिलाकर उन्हें बधाई दी।
















