Nobel Prize Chemistry 2026 Update; Shankar Balasubramanian | ACTPnews

Nobel Prize Chemistry 2026 Update; Shankar Balasubramanian


स्टॉकहोम5 घंटे पहले

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2026 का केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी. कागन और जापान के केन्सो सोआई को दिया गया है। दोनों वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान की करीब 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई है।

हेनरी बी. कागन और केन्सो सोआई ने यह समझाने में बड़ी मदद की कि मिरर इमेज जैसे दिखने वाले दो अणुओं में से सिर्फ एक को कैसे बनाया जा सकता है। यह खोज खास तौर पर दवाएं बनाने में काम आ रही है।

नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।

मिरर इमेज जैसे क्यों होते हैं अणु

इसे आसान तरीके से समझिए। हमारे दोनों हाथ लगभग एक जैसे दिखते हैं, लेकिन बायां हाथ दाएं हाथ की जगह नहीं ले सकता। कुछ अणु भी ऐसे ही होते हैं। इनके दो रूप होते हैं, जो एक-दूसरे की मिरर इमेज होते हैं।

दिक्कत यह है कि वैज्ञानिक जब ऐसे अणु बनाते हैं, तो कई बार दोनों रूप साथ बन जाते हैं। जबकि दवा बनाने में दोनों की जरूरत नहीं होती।

किसी दवा का एक रूप बीमारी पर असर कर सकता है, जबकि उसकी मिरर इमेज वाला दूसरा रूप कम असरदार या नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों की कोशिश थी कि जिस रूप की जरूरत है, वही बने।

कागन ने बताया- मिरर अणुओं में से जरूरत वाले को कैसे बनाया जाए

हमारे शरीर में अमीनो एसिड से प्रोटीन बनता है। अमीनो एसिड के दो रूप हो सकते हैं, जो एक-दूसरे की मिरर इमेज होते हैं। लेकिन शरीर प्रोटीन बनाने के लिए इनमें से सिर्फ एक रूप का इस्तेमाल करता है।

वैज्ञानिकों का सवाल था कि जब दोनों रूप बन सकते हैं, तो शरीर सिर्फ एक को ही क्यों चुनता है। 1986 में हेनरी बी. कागन ने इसका एक अहम रास्ता बताया।

उन्होंने ऐसा तरीका खोजा, जिससे रासायनिक प्रतिक्रिया में दोनों रूप बराबर नहीं बनते थे। एक रूप दूसरे से काफी ज्यादा बनने लगता था। यानी वैज्ञानिक ऐसी रासायनिक प्रक्रिया तैयार कर सकते हैं, जिसमें जिस अणु की जरूरत है, वही ज्यादा बने और दूसरा कम।

सोआई ने ऐसा अणु बनाया, जो अपने जैसे अणु बनाता था

इसके बाद केन्सो सोआई ने कागन के काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने 5-पाइरिमिडिल एल्केनॉल नाम के एक रासायनिक पदार्थ पर प्रयोग किया। उन्होंने ऐसी प्रक्रिया बनाई, जिसमें एक तरह का अणु बनने के बाद वह अपने जैसे दूसरे अणु बनने में मदद करता था।

इसे ऐसे समझिए- शुरुआत में अगर किसी एक तरह के अणु थोड़े ज्यादा बन गए, तो वही अणु आगे और अपने जैसे अणु बनाने में मदद करने लगे। फिर नए बने अणु भी यही काम करने लगे। इस तरह एक तरह के अणुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।

1995 के प्रयोग में शुरुआत में एक तरह के अणु की मात्रा सिर्फ 2% ज्यादा थी। लेकिन प्रक्रिया चलने के बाद यह बढ़त 87% तक पहुंच गई। यानी शुरुआत का छोटा-सा फर्क बहुत बड़ा हो गया।

इसके बाद 2003 में सोआई ने इसी विचार को और आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसी प्रक्रिया दिखाई, जिसमें एक तरह के अणु की मात्रा बढ़ते-बढ़ते 99.99% तक पहुंच सकती थी। यानी आखिर में लगभग सारे अणु एक ही तरह के बन सकते थे।

गूगल पर ट्रेड कर रहा है नोबेल

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