Rajat Sharma’s Blog | पेपर लीक माफिया को कुचलने के लिए कठोर कानून बने | ACTPnews

Rajat Sharma's Blog | पेपर लीक माफिया को कुचलने के लिए कठोर कानून बने


छात्र आंदोलन को लेकर देर रात के बाद कई अच्छी खबरें आई। सोनम वांगचुक ने 26 दिन से जारी अपना अनशन दो केंद्रीय मंत्रियों, जे पी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मोजूदगी में तोड़ा। सरकार ने वांगचुक को लिखित आश्वासन दिया कि छात्रों के खिलाफ दर्ज केस वापस होंगे और पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों को आर्थिक सहायता दी जाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधी रात को अपने वीडियो संदेश में कहा कि सरकार पेपर लीक के दोषियों को कठोर सज़ा देने के लिए कड़े कानून बनाएगी और उन पर मुकदमे चलाने के लिए देश के कई शहरों में फास्ट ट्रैक कोर्ट खोलने का काम शुरू हो चुका है। शुक्रवार को कॉकरोच जनता पार्टी के नेता केंद्रीय मंत्रियों से मिलने विट्ठलभाई पटेल हाउस गये। छात्र नेताओं की मांग है कि शिक्ष मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। ये सही है, करोड़ों छात्र पेपर लीक को लेकर परेशान हैं, प्रोटेस्ट कर रहे हैं, लेकिन कई राजनीतिक नेता उनके आंदोलन को हाइजैक करने में लगे हैं।

विपक्ष के हंगामे के कारण पिछले पांच दिन से संसद में छात्रों से जुड़े सवालों पर बहस नहीं हो पाई। एक तरफ छात्र जंतर मंतर में धरने पर बैठे हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने सांसदों के साथ कभी प्रधानमंत्री के आवास के पास, तो कभी गांधी स्मृति में धरने पर बैठे। कांग्रेस के अलावा लेफ्ट, समाजवादी पार्टी, RJD, ममता बनर्जी की TMC, शरद पवार की NCP, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसद, राहुल गांधी के साथ धरने पर बैठे।

राहुल गांधी की तीन मांगे हैं-  एक, धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। दो, जिन पुलिस वालों ने छात्रों पर 20 जुलाई को लाठियां बरसाई, उनके खिलाफ कार्रवाई हो और तीन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खेद प्रकट करें।

राहुल गांधी पेपर लीक मामले में अपना अलग “जंतर मंतर” चलाना चाहते हैं। वो कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में शामिल नहीं होना चाहते क्योंकि उन्हें शक है कि CJP को सरकार ने खड़ा किया है ताकि पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने का श्रेय राहुल गांधी को न  मिल सके। शक सिर्फ राहुल गांधी को ही नहीं है। अरविंद केजरीवाल को भी है, अखिलेश यादव को भी है। पेपर लीक के मामले में दो-दो मोर्चे खुल गए हैं क्योंकि सबको एक दूसरे पर शक है। राहुल गांधी पेपर लीक का आंदोलन अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इसीलिए वो हर थोड़े दिन में एक नया विकल्प तलाशते हैं। ऐसे अविश्वास के वातावरण में कोई समाधान कैसे निकलेगा?

पहली बात तो ये कि छात्रों की समस्या genuine है। लोगों की भावनाएं छात्रों के साथ हैं। कोई नहीं चाहता कि पेपर लीक हो। कोई नहीं चाहता कि प्रोटेस्ट करने वाले छात्रों के साथ जोर-जबरदस्ती हो। एक भी छात्र को अगर चोट पहुंचती है तो वो पूरे समाज की छाती पर कुठाराघात है। अच्छा तो ये होगा कि इस आंदोलन से, इस संकट से कुछ positive निकल कर बाहर आए। छात्रों को ये भरोसा दिलाया जाए कि सरकार पेपर लीक को जड़ से खत्म करेगी।

पेपर लीक कराने वाले लोग ताकतवर हैं, पैसे वाले हैं, वो जमानत पर छूट जाते हैं और जले पर नमक छिड़कते हैं। कानून ऐसा हो कि उनकी जमानत न हो पाए। सजा तीन से पांच साल से कहीं ज्यादा हो। पेपर लीक करने वालों के दिलोदिमाग में कानून का डर हो, सज़ा का खौफ हो। लेकिन ये रास्ता बातचीत से निकल सकता है, टकराव से नहीं। इसीलिए दोनों पक्षों को बातचीत के लिए मेज पर आना चाहिए।

मुझे लगता है कि सोनम वांगचुक की ये बात सही है कि शांतिपूर्वक आंदोलन करने वालों के खिलाफ कोई केस नहीं चलना चाहिए बल्कि छात्रों का ये impression दूर होना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट की बात कोई नहीं सुनता। सरकार शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट करने वालों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेने का आश्वासन दे चुकी है, इसीलिए सोनम वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ा। सोनम वांगचुक अनुभवी हैं। वो सरकार और छात्रों के बीच bridge का काम कर सकते हैं। आम तौर पर ऐसे आंदोलन में जहां कोई एक नेता नहीं होता, किसी एक mediator की जरूरत होती है।

कल रात “आज की बात” में मैने लंदन में बैठे सुप्रसिद्ध वकील और पूर्व सॉलीसिटर जनरल हरीश साल्वे से बात की। हरीश साल्वे की ये बात सही है कि पेपर लीक मामले में किसी मंत्री को हटाने से कुछ नहीं होगा। जरूरी ये है कि सिस्टम को बदला जाए, एक्जाम का सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिससे किसी बच्चे के मन में कोई शंका न हो। हरीश साल्वे ने सुझाव दिया कि एक ऐसी बॉडी बने, जो स्वतंत्र हो, स्वायत्त हो, और यही बॉडी पूरे देश के एक्जाम कराए। दूसरी बात उन्होंने कही कि पेपर लीक के खिलाफ एक अलग कानून बने क्योंकि मौजूदा कानूनों में आरोपियों के बचने की संभावना है, सजा कम है, आसानी से बेल मिल जाती है। नए कानून में ये सारी कमियां दूर हों, बेल का प्रोविजन खत्म हो, उम्र कैद की सजा हो। उम्मीद है सरकार इन बातों पर विचार करेगी और कानून लाएगी। फिलहाल सरकार का फोकस सिस्टम पर छात्रों का भरोसा कायम करने पर है।

यहां मैं ये भी बता दूं, जो लोग आंदोलन की आड़ में पुलिस पर चाकू से वार कर रहे हैं, पत्थर चला रहे हैं, वो छात्र नहीं हैं। ये वो लोग हैं जो छात्रों के आंदोलन की आड़ में हिंसा भड़काना चाहते हैं। साफ दिखाई दे रहा है, उनकी कोशिश है कि पुलिसवालों को घेर कर मारा जाए, पुलिस तैश में आ जाए, लाठी चलाए, पब्लिक के दो चार लोगों को गहरी चोट लगे और पूरी सरकार इस चक्रव्यूह में फंस जाए। छात्र जीवन में पुलिस की मार मैंने भी खाई है। मैं जानता हूं किसी भी आंदोलन में अराजकता फैलाने वाले कैसे घुसते हैं। हालांकि आज का जमाना अलग है। आज हर किसी के हाथ में mobile है, हर angle से video बनता है, दंगा करने वाले पकड़े ना जाएं, Trace ना हो पाएं इसके लिए वो mask लगाते हैं, वो normal messaging platforms के बजाए BitChat जैसे tools का इस्तेमाल करते हैं, Internet bypass करके device to device contact होता है।

इसमें ना SIM होता है ना mobile number, ना ही E-mail address। इसलिए पुलिस के लिए ऐसे फोन की mapping करना संभव नहीं होता। पुलिस पर हमला करने वाले पूरे आंदोलन को बदनाम करते हैं। इसीलिए ऐसे तत्वों से सावधान रहने की जरूरत है। उनके खिलाफ अगर पुलिस action ले तो किसी को उन्हें defend नहीं करना चाहिए। मैं छात्रों का दर्द समझता हूं। मैंने भी छात्र आंदोलनों में हिस्सा लिया है, पुलिस की मार खाई है, जेल भी जाना पड़ा लेकिन उस ज़माने में छात्र आंदोलनों पर राजनीतिक दलों का ज्यादा प्रभाव नहीं होता था। छात्र अपना आंदोलन चलाते थे। अब तो पता ही नहीं चलता कि कौन छात्र है, कौन किसी पार्टी का activist है।

दूसरी बात, जिस तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर post किए जाते हैं, वो misinformation का source बन जाते हैं। अफवाहें फैलती हैं, गलतफहमियां पनपती हैं और इस कारण हिंसा भी भड़कती है। मेरा अनुभव कहता है कि हिंसा से कभी भी हल नहीं निकलता। अगर नीयत समस्या हल करने की है तो दोनों पक्षों को अपनी ego छोड़कर बातचीत की मेज पर आना चाहिए। पेपर लीक गंभीर मसला है। इसका रास्ता सरकार को निकालना है। छात्रों को ये विश्वास दिलाना है कि सरकार युवाओं के साथ है। सरकार पेपर लीक माफिया को मिट्टी में मिलाने के लिए तैयार है। प्रोटेस्ट करने वालों को भी सरकार के साथ बातचीत की पहल को स्वीकार करना चाहिए। इसी में सबका भला है। (रजत शर्मा)

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 23 जुलाई, 2026 का पूरा एपिसोड

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