वॉशिंगटन डीसी2 घंटे पहले
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अमेरिका के साथ हुई न्यूक्लियर डील के बाद सऊदी अरब परमाणु बम बना सकता है।अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट अमेरिकी संसद को दी गई है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया है कि सऊदी ने अभी परमाणु बम बनाने का फैसला नहीं किया है।
जुलाई में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु बिजली का ढांचा तैयार करने को लेकर समझौता हुआ था।
अब तक दुनिया के 9 देशों के पास परमाणु हथियार हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजराइल शामिल है। हालांकि इजराइल ने आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है।

नवंबर 2025 में व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान।
परमाणु बिजली बनाने वाली तकनीक से हथियार का रास्ता खुल सकता है
दरअसल परमाणु तकनीक से बिजली बनाने के लिए यूरेनियम को एक खास प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। इसे यूरेनियम एनरिचमेंट कहते हैं।
समझौते के तहत सऊदी अरब यूरेनियम को करीब 20% तक एनरिच कर सकेगा। यह परमाणु बम के लिए जरूरी स्तर से काफी कम है।
समस्या यह है कि एक बार किसी देश के पास यूरेनियम को 20% तक एनरिच करने की क्षमता आ जाए, तो उसे हथियार बनाने लायक स्तर तक जाने में कम समय लग सकता है।
इसी वजह से अमेरिकी सांसदों को डर है कि सऊदी अरब भविष्य में परमाणु हथियार बना सकता है।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कर चुके हैं हथियार बनाने की बात
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो सऊदी अरब भी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करेगा।
अमेरिकी अधिकारी भी लंबे समय से मानते रहे हैं कि सऊदी परमाणु हथियार बनाने में दिलचस्पी रखता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी ने बम बनाने का फैसला कर लिया है।
सांसदों का सवाल- सऊदी को अपने देश में एनरिचमेंट फैसेलिटि क्यों चाहिए?
अमेरिकी सीनेटर एड मार्की और जेफ मर्कली समेत छह डेमोक्रेट सांसदों ने इस समझौते का विरोध किया है।
उनका सवाल है कि अगर सऊदी अरब का मकसद सिर्फ परमाणु बिजली बनाना है, तो वह अपने देश में यूरेनियम एनरिच करने की सुविधा क्यों चाहता है।
अमेरिका बोला- समझौता परमाणु हथियार बनाने के लिए नहीं
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि समझौते का मकसद सऊदी अरब में शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा विकसित करना है।
अमेरिका के मुताबिक, इससे क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत होगी और परमाणु हथियारों को फैलने से रोकने के नियमों का पालन होगा।
इस समझौते की शुरुआत जो बाइडेन के राष्ट्रपति रहते हुई थी। तब अमेरिका चाहता था कि परमाणु समझौते के बदले सऊदी अरब, इजराइल को औपचारिक मान्यता दे।
इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका, सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी, आधुनिक हथियार और असैन्य परमाणु कार्यक्रम में सहयोग देने को तैयार था।
बदले में सऊदी अरब से उम्मीद थी कि वह इजराइल के साथ दूतावास खोलेगा, राजदूत नियुक्त करेगा और आधिकारिक संबंध शुरू करेगा।
हालांकि, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध की वजह से यह प्लान फेल हो गया।
बाद में ट्रम्प ने रणनीति बदली और इजराइल के साथ रिश्तों को इस समझौते से अलग कर दिया।

ओवल ऑफिस में मुलाकात के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान। तस्वीर नवंबर 2025 की है।
अमेरिकी संसद के पास समझौते की समीक्षा के लिए 90 दिन हैं
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुआ यह समझौता 30 साल का है। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में परमाणु बिजली से जुड़ा ढांचा तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाएंगी।
अमेरिकी संसद इस समझौते की समीक्षा कर रही है। इसके लिए संसद के पास 90 दिन का समय है।
अगर इस दौरान संसद समझौते को रोकने के लिए प्रस्ताव पास नहीं करती, तो यह अपने आप लागू हो सकता है।
सऊदी अरब NPT का सदस्य है
सऊदी अरब न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) का सदस्य है। इस संधि के तहत सदस्य देश परमाणु हथियार नहीं बनाने और अपने परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रखने पर सहमत होते हैं।
अगर सऊदी अरब खुलकर परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ता है, तो उसे अमेरिका और यूरोपीय देशों समेत कई देशों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जिससे निवेश, व्यापार और रक्षा सहयोग प्रभावित हो सकता है।
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