लहर-लहर:परिवार संस्कारों की विरासत देता है, लेकिन पहचान तो खुद बनाई जाती है | ACTPnews

लहर-लहर:परिवार संस्कारों की विरासत देता है, लेकिन पहचान तो खुद बनाई जाती है

इस दुनिया में परिवार की सामाजिक आवश्यकता क्या है? परिवार बनते हैं, फैलते हैं और बिखर जाते हैं, मिट जाते हैं। परिवार हमेशा के लिए नहीं होते हैं। बच्चे को मां-बाप दोनों की जरूरत होती है। उनके बिना वो ठीक से पल नहीं सकता। इसलिए परिवार बना। भाई-बहन भी परिवार है। परिवारों को कॉमन बिजनेस भी जोड़ता है। लोग साथ जुड़कर काम करते हैं। लेकिन समय के साथ कुछ स्वाभाविक परिवर्तन होते हैं। जैसे- दो भाई एक ही घर में पले और दोनों का एक-दूसरे से लगाव है। फिर दोनों की शादी और बच्चे हो जाते हैं। बच्चे अलग-अलग शहरों में चले जाते हैं। बच्चे बड़े होते हैं। उनकी भी शादियां होती हैं और बच्चे होते हैं। तो ये बच्चे आपस में दूर के रिश्तेदार हो जाते हैं। वो जो परिवार कभी बहुत करीब था, वो ज्यादा से ज्यादा चार पीढ़ियों में खत्म हो जाता है, बिखर जाता है। किसी को किसी की खबर ही नहीं होती। और ऐसा नहीं है कि वो अकेले रह जाते हैं। वहां उनके भी फिर छोटे-छोटे परिवार बन रहे होते हैं। वो फिर वैसी ही इकाई से शुरू करते हैं। परिवार का किस्सा तीन-चार जेनरेशन से ज्यादा का नहीं है। फिर नए परिवार बनते हैं और वो तीन-चार जेनरेशन चलते हैं। फिर एक नया परिवार बनता है और नए बच्चे आते हैं। परिवार एक जरूरत है जो बहुत जल्दी खत्म हो जाती है। यह जरूरत वक्त के साथ खत्म जाती है। इसलिए कि धीरे-धीरे वो बच्चे एक-दूसरे से अजनबी हो जाते हैं। बदलते समय के साथ पारंपरिक संयुक्त परिवारों का दौर पीछे छूट गया है। आज के समय में अगर बच्चे माता-पिता से अलग और स्वतंत्र रहते हैं, तो यह पारिवारिक रिश्तों का टूटना नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन का एक स्वाभाविक यथार्थ है। आज की व्यस्त ज़िंदगी में परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे से मिलने के लिए पहले से समय तय करना पड़ता है। जैसे मुझे फरहान से मिलने के लिए 3 से 5 दिन पहले समय तय करना पड़ता है। पहले अमेरिका या इंग्लैंड में रिश्तेदारों से मिलने से पहले फोन करने की प्रथा अजीब मानी जाती थी, लेकिन जो बात पहले लोगों को हैरान करती थी, वह अब ज़िंदगी का एक आम हिस्सा बन गई है। परिवार सिर्फ़ उन लोगों का नाम नहीं है, जिनसे हमारा खून का रिश्ता है। परिवार वह जगह है जहां इंसान को सिर्फ इसलिए नहीं पसंद किया जाना चाहिए कि वह अपना है, बल्कि इसलिए भी सम्मान दिया जाना चाहिए कि वह एक अलग इंसान है- अपनी सोच, इच्छा और आजादी के साथ। इसलिए परिवार में मोहब्बत के साथ संवाद होना चाहिए, असहमति की गुंजाइश होनी चाहिए और एक-दूसरे को सुनने का धैर्य होना चाहिए। एक अच्छे परिवार में बच्चों को ईमानदारी, आत्मनिर्भरता और तर्कशीलता सिखानी चाहिए। बच्चों का अपने फैसले लेना और आजाद होकर जीना स्वाभाविक है; अस्वाभाविक तो यह है कि उनकी हर सोच, हर कदम और हर फैसले पर बेवजह नियंत्रण रखा जाए। बच्चे हमारे हैं, लेकिन हमारी मिल्कियत नहीं हैं। एक उम्र के बाद उन्हें फैसले लेने, गलतियां करने और दुनिया बनाने का अधिकार है। माता-पिता का काम हर कदम पर उनके रास्ते को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि इतनी समझ देना है कि वे रास्ते पर सही और गलत में फर्क कर सकें। खानदान आपको एक विरासत दे सकता है- नाम, भाषा, संस्कार, कहानियां और कुछ वैल्यू, लेकिन वह आपकी पहचान तय नहीं कर सकता। अगर बेटा सिर्फ पिता की आवाज दोहराता रहे, तो वह विरासत नहीं, प्रतिध्वनि होती है। आखिरकार किसी परिवार की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उस परिवार के बच्चे कितने अच्छे इंसान बनते हैं। परिवार का मकसद सिर्फ अपने लोगों को अपना बनाए रखना नहीं है; परिवार का मकसद ऐसे इंसान बनाना है जो इंसानियत का भी सम्मान कर सकें। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *