6 मिनट पहले
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क्यूबा के उत्तर-पश्चिमी तट के पास सोमवार को 6.1 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक, भूकंपका केंद्र पश्चिमी क्यूबा के मंटुआ शहर से करीब 104 किलोमीटर दूर समुद्र में था। इसकी गहराई लगभग 26 किलोमीटर दर्ज की गई।
भूकंप के झटकों से क्यूबा के कई इलाकों में इमारतें हिल गईं और लोग घरों व दफ्तरों से बाहर निकल आए। राजधानी हवाना समेत कई शहरों में कंपन महसूस किया गया।
झटकों का असर अमेरिका के फ्लोरिडा तक पहुंचा। मियामी, फोर्ट लॉडरडेल और ऑरलैंडो के आसपास के इलाकों में भी लोगों ने कंपन महसूस होने की जानकारी दी। एहतियात के तौर पर कुछ सरकारी कार्यालय खाली कराए गए।
मेक्सिको के युकातान प्रायद्वीप, कैंकून, प्लाया डेल कारमेन और टुलुम में भी झटके महसूस किए गए। हालांकि क्यूबा, अमेरिका और मेक्सिको में कहीं से भी बड़े नुकसान या जनहानि की खबर नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस इलाके में इतने शक्तिशाली भूकंप बेहद दुर्लभ हैं। 1880 के बाद पहली बार इतनी तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया है। भूकंप के बाद सुनामी की कोई चेतावनी जारी नहीं की गई है। हालांकि अधिकारियों ने लोगों को आफ्टरशॉक की संभावना को देखते हुए सतर्क रहने की सलाह दी है।
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जर्मनी-फ्रांस ने 100 अरब यूरो की संयुक्त फाइटर जेट परियोजना छोड़ी

जर्मनी और फ्रांस ने नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान के संयुक्त विकास की महत्वाकांक्षी फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) परियोजना के मुख्य हिस्से को समाप्त करने पर सहमति बनाई है। एयरबस और दसॉ एविएशन के बीच लंबे समय से जारी तकनीकी और व्यावसायिक विवादों का समाधान नहीं निकलने के बाद दोनों देशों ने यह फैसला लिया।
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पिछले सप्ताह मोंटेनेग्रो में आयोजित ईयू-वेस्टर्न बाल्कन्स समिट के दौरान परियोजना पर चर्चा की। जर्मन अधिकारियों के अनुसार, दोनों नेताओं ने माना कि परियोजना में शामिल कंपनियों के बीच जारी गतिरोध समाप्त होने की संभावना नहीं है। इसके बाद मर्ज ने मैक्रों को संयुक्त फाइटर जेट निर्माण योजना आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि एयरबस और दसॉ एविएशन के बीच समझौता नहीं हो पाने पर दोनों नेताओं ने खेद जताया। विवाद का केंद्र विकास चरण पर नियंत्रण, बौद्धिक संपदा अधिकार और विमान की तकनीकी आवश्यकताओं को लेकर था।
करीब 100 अरब यूरो की इस परियोजना की शुरुआत 2017 में मैक्रों और तत्कालीन जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने की थी। बाद में स्पेन भी इसमें शामिल हुआ। परियोजना के तहत एक छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान, ड्रोन नेटवर्क और सुरक्षित “कॉम्बैट क्लाउड” प्रणाली विकसित की जानी थी।
सूत्रों के मुताबिक, मुख्य फाइटर जेट कार्यक्रम भले बंद हो जाए, लेकिन “कॉम्बैट क्लाउड” जैसे कुछ तकनीकी सिस्टम FCAS नाम के तहत आगे बढ़ाए जा सकते हैं।
FCAS को यूरोप की सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजनाओं में गिना जा रहा था।
नाटो ने आर्कटिक में ड्रोन टास्क फोर्स लॉन्च की: रूस को रोकने के नाम पर नई सैन्य पहल

नाटो ने आर्कटिक क्षेत्र में मानव रहित सैन्य प्रणालियों के परीक्षण के लिए नई प्रयोगात्मक इकाई टास्क फोर्स X-आर्कटिक (TFX-Arctic) शुरू की है। यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब आर्कटिक में नाटो की सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं और रूस लगातार क्षेत्र के सैन्यीकरण पर चिंता जता रहा है।
सप्ताहांत में इटली के ला स्पेजिया बंदरगाह से रिसर्च वेसल Alliance के रवाना होने के साथ मिशन की शुरुआत हुई। नाटो के अनुसार, यह टास्क फोर्स आर्कटिक, नॉर्थ अटलांटिक और हाई नॉर्थ क्षेत्रों में ड्रोन और अन्य मानव रहित प्रणालियों का परीक्षण करेगी। इसका उद्देश्य कठिन परिस्थितियों में लगातार निगरानी और बहु-क्षेत्रीय सैन्य सूचनाएं जुटाने की क्षमता को परखना है।
नाटो ने बताया कि यह कार्यक्रम 2026 और उसके बाद तक जारी रहेगा। यह बाल्टिक सागर में पिछले वर्ष शुरू किए गए समान प्रयोगात्मक कार्यक्रम के अनुभवों पर आधारित है। एडमिरल पियरे वांडियर ने कहा कि यह पहल दुनिया के सबसे कठिन परिचालन क्षेत्रों में नई तकनीकों के परीक्षण और भविष्य के सैन्य मानकों को तय करने में मदद करेगी।
इसी दौरान नाटो का बालटॉप्स 2026 सैन्य अभ्यास भी बाल्टिक क्षेत्र में जारी है। इसमें 15 सदस्य देशों के करीब 6,000 सैनिक भाग ले रहे हैं। नाटो ने रूस से संभावित खतरों को रोकने को इस अभ्यास का प्रमुख उद्देश्य बताया है।
रूस ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि आर्कटिक क्षेत्र में सैन्यीकरण नाटो की गतिविधियों का परिणाम है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि नाटो आर्कटिक को संभावित संघर्षों के लिए सैन्य आधार के रूप में देख रहा है और मॉस्को अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।
रूस की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने हाल ही में कहा कि आर्कटिक में “रूसी खतरे” की बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है ताकि नाटो सदस्य देशों में सैन्य खर्च बढ़ाने को उचित ठहराया जा सके।
आर्कटिक क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों, नए समुद्री मार्गों और रणनीतिक महत्व के कारण वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।













