हिमालय की 221 झीलें ला सकती हैं नेपाल जैसी तबाही:491 साल में 254 बार फट चुकीं; उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियर सबसे बड़ा खतरा | ACTPnews

हिमालय की 221 झीलें ला सकती हैं नेपाल जैसी तबाही:491 साल में 254 बार फट चुकीं; उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियर सबसे बड़ा खतरा

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने एक बार फिर हिमालय में ग्लेशियरों से जुड़े खतरे की ओर ध्यान खींचा है। इसी बीच देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत 3 संस्थानों की नई रिसर्च सामने आई है। इसमें हिमालय रीजन में 221 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिनके फटने पर अचानक बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउट बर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बन सकता है। रिसर्च में कोसी, यारलुंग जांगबो, मानस और ऊपरी सिंधु नदी घाटियों को सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में रखा गया है। भारत में भी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम की कई नदी घाटियां संवेदनशील जोन हैं। बाढ़ आई तो इनकी चपेट में 6 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 39 जिलों पर असर पड़ सकता है। उत्तराखंड में खतरा सिर्फ ग्लेशियल झीलों से नहीं, बल्कि खड़ी ढलानों पर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियरों से भी है। अलकनंदा बेसिन में हुए एक दूसरे अध्ययन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं। इनके टूटने पर बर्फ के साथ चट्टान और मलबा तेजी से नीचे आ सकता है, जिससे बद्रीनाथ-माणा समेत चमोली के निचले इलाकों को खतरा हो सकता है। 1990 के बाद बनीं 1052 नई ग्लेशियल झीलें कोसी घाटी में 1125 झीलें, 47 संवेदनशील कोसी नदी घाटी के अरुण क्षेत्र में 1,125 झीलें गई हैं। यारलुंग जांगबो में 773, मानस की दांगमे चू घाटी में 715 और ऊपरी सिंधु घाटी में 619 झीलें हैं। पूरे हिमालय में 221 महत्वपूर्ण झीलों में कोसी घाटी की 47 झीलें शामिल हैं, जो सबसे ज्यादा हैं। स्टडी के मुताबिक, भारत की चिनाब, झेलम, तीस्ता और व्यास नदी घाटियां संवेदनशील हैं। नेपाल की कोसी, भूटान की मानस और तिब्बत की यारलुंग जांगबो घाटियों की झीलों से आने वाला पानी भारत के डाउनस्ट्रीम इलाकों को भी प्रभावित कर सकता है। भारत में चिनाब, झेलम, तीस्ता और व्यास ज्यादा संवेदनशील अध्ययन में जम्मू-कश्मीर की चिनाब और झेलम, हिमाचल प्रदेश की चिनाब और व्यास तथा सिक्किम की तीस्ता नदी घाटी को विशेष चिंता वाले क्षेत्र माना गया है। यहां खतरा सिर्फ झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ तक सीमित नहीं है। संभावित बाढ़ के रास्ते में सड़कें, पुल, आबादी और जलविद्युत परियोजनाएं पर भी खतरा बना हुआ है। अचानक आने वाला पानी सिर्फ नदी के बहाव को नहीं बढ़ाएगा, बल्कि रास्ते में मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान पहुंचा सकता है। 491 साल में 254 बार फटीं ग्लेशियल झीलें उत्तराखंड के लिए क्यों अहम है यह अध्ययन? उत्तराखंड में अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं। हैंगिंग ग्लेशियर ऐसे ग्लेशियर हैं, जो बहुत ऊंची और खड़ी ढलानों पर टिके होते हैं। इनके नीचे गहरी घाटी या सीधी ढलान हो सकती है। अगर इनका कोई बड़ा हिस्सा टूटता है तो बर्फ के साथ पत्थर और मलबा भी तेज गति से नीचे आ सकता है। अलकनंदा बेसिन में कुल 848 ग्लेशियर हैं, जिनमें 219 को हैंगिंग ग्लेशियर माना गया है। इनका क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किमी है। इनमें करीब 2.39 घन किमी बर्फ है, जिसमें करीब 0.74 घन किमी अस्थिर बर्फ मानी गई है। विष्णुगंगा में सबसे ज्यादा 69 हैंगिंग ग्लेशियर अलकनंदा की सहायक नदियों में विष्णुगंगा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 69 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं। इनका क्षेत्रफल 28.21 वर्ग किमी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अस्थिर बर्फ का करीब 68% हिस्सा 0.1 से 0.5 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले ग्लेशियरों में है यानी छोटे ग्लेशियर भी महत्वपूर्ण हो खतरनाक हो सकते हैं। बद्रीनाथ-माणा से सिर्फ 1.4 किमी ऊपर 3 ग्लेशियर बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र के ऊपर तीन ग्लेशियर हैं। सबसे नजदीकी ग्लेशियर बस्तियों से करीब 1.4 किमी ऊपर है। तीनों में कुल अस्थिर बर्फ करीब 0.012 घन किमी है। इन ग्लेशियरों में कई दरारें भी देखी गई हैं। मॉडल के मुताबिक बद्रीनाथ, माणा, हनुमान चट्टी और घांघरिया संभावित असर वाले क्षेत्रों में आते हैं। नीलकंठ बेस कैंप की ओर जाने वाला क्षेत्र भी खतरे वाले क्षेत्र में है। बड़ी मात्रा में बर्फ टूटने की स्थिति में यह इलाके प्रभावित हो सकते हैं। खतरा बढ़ा, लेकिन उसी रास्ते में निर्माण भी बढ़ा खतरे को पहले पहचानना ही बचाव वैज्ञानिकों के मुताबिक सभी 219 हैंगिंग ग्लेशियरों को एक जैसा खतरनाक मानने की जरूरत नहीं है। पहले उन ग्लेशियरों की पहचान जरूरी है जहां खतरा ज्यादा है। उनकी लगातार निगरानी की जानी चाहिए। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों के साथ जमीन पर लगे रडार, कैमरे, बर्फ के अंदर होने वाली हलचल की निगरानी और डॉप्लर रडार जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। खतरे के संकेत समय रहते मिलें तो सड़क बंद करने और लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। ——————- यह भी पढ़ें भास्कर एक्सक्लूसिव : उत्तराखंड में 11% कम हुई बर्फ, तेजी से फैले शहर:जहां कंक्रीट वहां ज्यादा गर्मी, पानी-खेती से पर्यटन तक बढ़ी चुनौती उत्तराखंड को बर्फीली चोटियों, घने जंगलों और नदियों के राज्य के रूप में देखा जाता है, लेकिन पिछले 30 साल में इसकी जमीन की तस्वीर तेजी से बदली है। 1992 से 2022 के बीच बर्फ का क्षेत्र घटा, प्राकृतिक वनस्पति कम हुई और निर्मित क्षेत्र करीब 13 गुना बढ़ गया। इसी दौरान बारिश और तापमान के पैटर्न में भी बदलाव दिखाई दिया। (पढ़ें पूरी खबर)



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