Asaram Case Verdict: Justice Mongas 10 Historic Comments | ACTPnews

Asaram Case Verdict: Justice Mongas 10 Historic Comments


जोधपुर11 घंटे पहलेलेखक: ​कमल वैष्णव

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पीड़िता का जन्म 4 जुलाई को हुआ था, जो अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस है। वह उस तारीख की तरह ही स्वतंत्रता, गरिमा और स्वाभिमान की प्रतीक थी। लेकिन 15 अगस्त 2013 की रात जब पूरा हिंदुस्तान अपनी आजादी का जश्न मना रहा था, ठीक उसी वक्त जोधपुर की एक कुटिया में उस बच्ची की स्वतंत्रता, गरिमा और मासूमियत तीनों एक साथ छीन ली गईं।

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राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने नाबालिग रेप मामले में बुधवार को आसाराम की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए 92 पन्नों के फैसले की शुरुआत इन्हीं शब्दों से की। इन शब्दों ने पूरे मामले को बयां कर दिया।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने न केवल अपराधी की सजा बरकरार रखी, बल्कि फैसले के हर पन्ने पर न्याय की ऐसी दार्शनिक व्याख्या की, जो भारतीय न्यायिक इतिहास में दर्ज हो गई है।

31 अगस्त 2013 को पुलिस ने आसाराम को गिरफ्तार किया था। (फाइल फोटो)।

31 अगस्त 2013 को पुलिस ने आसाराम को गिरफ्तार किया था। (फाइल फोटो)।

आइए, फैसले के उन 10 ऐतिहासिक पहलुओं को समझते हैं, जो कोर्ट ने अपने शब्दों में पिरोए हैं।

1. आजादी के जश्न वाली रात छीनी मासूमियत

हाईकोर्ट ने बेहद भावुक शब्दों में कहा कि पीड़िता का जन्म 4 जुलाई को हुआ था, जो अमेरिका की स्वतंत्रता का प्रतीक दिन माना जाता है। 15 अगस्त भारत का स्वतंत्रता दिवस।15 अगस्त 2013 की रात जब पूरा देश आजादी मना रहा था, उसी रात उस बच्ची की आजादी, गरिमा और मासूमियत छीन ली गई। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि जिस व्यक्ति को वह भगवान मानती थी, उसी ने उसके विश्वास को तोड़ा।

कोर्ट ने लिखा- “स्वतंत्रता, गरिमा और स्वाभिमान के प्रतीक उस दिन जन्मी बच्ची से- ठीक उसी रात जब भारत अपनी आजादी का जश्न मना रहा था – ये तीनों एक साथ छीन लिए गए। और जिसने यह किया, उसे वह ‘भगवान’ मानती थी।”

2. निर्दोषता कभी अंधेरे और बंद दरवाजे नहीं खोजती

बचाव पक्ष का तर्क था कि कुटिया के अंदर हुई घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा-

“रात के 10:30 बजे उस कुटिया में केवल दो लोग थे। दरवाजा अंदर से बंद था, कुंडी लगी थी और बत्तियां बुझा दी गई थीं। ऐसे हालात में पीड़िता से किसी तीसरे गवाह की मांग करना – उसे उसी एकांत के लिए दंडित करना (अन्याय) होगा, जो उसके उत्पीड़क (आरोपी) ने जानबूझकर रचा था। आखिर एक धर्मगुरु रात के अंधेरे में एक लड़की को अकेले अपने कमरे में क्यों बुलाएगा? निर्दोषता कभी अंधेरे और बंद दरवाजे नहीं खोजती।”

3. शरणस्थली कैसे बन गई ‘शिकारी का अड्डा’?

पीड़िता की चुप्पी पर समाज का आईना दिखाते हुए कोर्ट ने कहा-

“वह बच्ची उस शख्स के पास शरण मांगने आई थी जिसे वह भगवान मानती थी। वह हाथ जोड़कर आई थी। वह नहीं जानती थी कि जो जगह उसे ‘शरणस्थली’ लग रही थी, वह दरअसल एक ‘शिकारी का अड्डा’ (Hunter’s den) बन चुकी है। रेप केवल शारीरिक अपराध नहीं है, यह समाज की ओर से थोपी गई ‘शर्म’ का बोझ है जो पीड़िता को चुप रहने पर मजबूर करता है।”

4. एफआईआर की ‘व्याकरणिक गलती’ और उर्दू शायरी भी बनी डर की गवाही

पीड़िता ने पहली शिकायत में ‘जबरदस्ती कपड़े उतारे’ को काटकर ‘उतारने लगा’ किया था। हाईकोर्ट ने इसे डर की मनोवैज्ञानिक गवाही माना और न्याय के लिए अमीर मीनाई के शेर का उदाहरण दिया-

“क़रीब है यारो रोज़े महशर, छुपेगा कुश्तों का खून क्यों कर;

जो चुप रहेगी ज़बाने खँजर, लहू पुकारेगा आस्तीं का।”

(अर्थात: अगर कातिल का खंजर खामोश भी रहे, तो आस्तीन पर लगा खून खुद गवाही देगा)। कोर्ट ने इसे ‘न्याय और साहित्य का बेहतरीन संगम’ बताया।

5. याददाश्त कोई ‘तस्वीर’ नहीं है

क्रॉस-एग्जामिनेशन में बयानों के विरोधाभासों को बचाव पक्ष ने झूठ बताया, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। इस पर कहा-

“मानवीय धारणा कोई सटीक उपकरण नहीं है। याददाश्त अपने आप में कोई तस्वीर नहीं होती – यह एक जीवंत, लेकिन समय के साथ धुंधली होती छाप है। अगर सच बोलने वाले गवाह छोटी बातों पर लड़खड़ा जाएं, तो वे झूठे नहीं हैं, बल्कि यह उस साधारण इंसान की बची-खुची यादें हैं जिन्हें समय पहले ही मिटाना शुरू कर चुका है।”

6. अंधविश्वास कैसे विवेक पर भारी पड़ता है?

पढ़े-लिखे परिवार द्वारा ‘भूत-प्रेत’ की बात मान लेने पर कोर्ट ने कहा-

“आस्था एक बेहद शक्तिशाली ताकत है – इतनी कि यह सबसे तेज दिमाग वालों के तर्क और विवेक को भी मात दे सकती है। जब कोई व्यक्ति संकट में हो, ठीक ऐसे ही क्षणों में अंधविश्वास को सबसे तैयार श्रोता मिलते हैं।” संकट के समय इंसान सबसे ज्यादा भावनात्मक और कमजोर हो जाता है।

7. ‘50 करोड़ की साजिश’ वाली दलील खारिज

बचाव पक्ष का सबसे बड़ा दावा था कि यह 50 करोड़ रुपए ऐंठने की एक पहले से रची गई साजिश है। कोर्ट ने इस मनगढ़ंत कहानी को खारिज करते हुए लिखा-

“अगर यह पहले से रची गई कोई साजिश होती, तो शिकायतकर्ता आसानी से घटना के तुरंत बाद सीधे जोधपुर में ही रिपोर्ट दर्ज करवा सकते थे। इसके बजाय, वे जोधपुर से जयपुर गए, फिर शाहजहांपुर गए और अंत में वापस दिल्ली आकर जीरो एफआईआर करवाई। यह लंबा रास्ता और यात्रा ही यह साबित करती है कि यह कोई साजिश नहीं थी, बल्कि डर और आम मानवीय परिस्थितियों के तहत उठाया गया एक स्वाभाविक कदम था।’

8. जीवन का ‘पहले’ और ‘बाद’ में बंट जाना

मेंटल ट्रॉमा पर हाईकोर्ट ने लिखा-

“रेप पीड़िता केवल एक घाव नहीं उठाती, वह एक ‘मिटाना’ (Erasure) बर्दाश्त करती है – अपनी पहचान का खत्म करना, जो वह उस पल से पहले थी। इस घिनौने कार्य ने उसके जीवन को हमेशा के लिए ‘पहले’ और ‘बाद’ के दो हिस्सों में बांट दिया है। रेप सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि पीड़िता की पहचान और आत्मसम्मान को मिटा देने वाला अपराध है। इस घटना ने उसके जीवन को हमेशा के लिए “पहले” और “बाद” में बांट दिया।

9. 81 पन्नों की तीखी जिरह के बाद भी नहीं डिगी सच्चाई

आसाराम के बचाव में देश के नामचीन वकीलों ने पीड़िता को झूठा साबित करने के लिए उससे कोर्ट में बेहद तीखे सवाल किए। इसका जिक्र करते हुए कोर्ट ने लिखा-

“पीड़िता से बचाव पक्ष के वकीलों ने बहुत लंबी और विस्तृत जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) की, जो रिकॉर्ड के 81 पन्नों में दर्ज है। लेकिन इसके बावजूद वह अपनी मुख्य गवाही पर पूरी तरह से अडिग रही। वकीलों के तमाम तीखे सवालों के तीर भी उस बच्ची के मुख्य बयान को हिला नहीं सके, जो इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि वह सच बोल रही है।”

10. अपराधी की कैद बनाम पीड़िता की सजा

जब 86 साल की उम्र का हवाला देकर रियायत की मांग की गई, तो कोर्ट ने कहा-

“आरोपी के लिए कैद सिर्फ शारीरिक है, जिसकी कुछ दीवारें हैं। लेकिन पीड़िता पर जो सजा थोपी गई, उसकी कोई दीवार नहीं है। न कोई वारंट जारी हुआ, न अदालत ने सजा सुनाई। उसकी आत्मा पर लिखी यह सजा उम्रभर की है, जिसमें कोई पैरोल नहीं है।”

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