परमाणु विस्फोट पकड़ने अमेरिका ने जमीन के नीचे धमाके किए:जमीन के कंपन का डेटा जुटाया; चीन पर छिपकर परमाणु टेस्ट करने के आरोप | ACTPnews

परमाणु विस्फोट पकड़ने अमेरिका ने जमीन के नीचे धमाके किए:जमीन के कंपन का डेटा जुटाया; चीन पर छिपकर परमाणु टेस्ट करने के आरोप

अमेरिका ने बुधवार को नेवादा में जमीन के नीचे एक बड़ा विस्फोट किया। इसमें परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं हुआ। वैज्ञानिकों ने शक्तिशाली रासायनिक विस्फोटक लगाए और उनके फटने पर पैदा हुए कंपन और दूसरे संकेतों को रिकॉर्ड किया। इस प्रयोग का मकसद यह समझना था कि अगर कोई देश जमीन के नीचे छोटा परमाणु धमाका करे और उसके संकेतों को छिपाने की कोशिश करे, तो उसका पता कैसे लगाया जा सकता है। यह प्रयोग ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका पहले भी चीन पर गुप्त परमाणु परीक्षण करने की कोशिश का आरोप लगा चुका है। साल 2020 में अमेरिका ने चीन के लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र में ऐसे सीक्रेट टेस्ट किए जाने का आरोप लगाया था। जमीन के करीब 900 फीट नीचे किया गया टेस्ट यह प्रयोग नेवादा नेशनल सिक्योरिटी साइट के पी-टनल इलाके में किया गया। यह सुरंग जमीन के करीब 900 फीट नीचे है और लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रयोगों के लिए इस्तेमाल होती रही है। वैज्ञानिकों ने सुरंग के अंदर रासायनिक विस्फोटक लगाए। विस्फोट के दौरान पैदा होने वाले कंपन, ध्वनि और दूसरे संकेतों को रिकॉर्ड करने के लिए कई तरह के सेंसर लगाए गए थे। इस प्रयोग से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल कंप्यूटर मॉडल और परमाणु विस्फोट का पता लगाने वाले सिस्टम को बेहतर बनाने में किया जाएगा। इससे अमेरिका को दुनिया में कहीं भी होने वाले संभावित परमाणु धमाकों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। परमाणु बम का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? अमेरिका का मकसद परमाणु धमाका करना नहीं था। उसे यह देखना था कि जमीन के अंदर विस्फोट होने पर बाहर किस तरह के संकेत मिलते हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने परमाणु बम की जगह रासायनिक विस्फोटक इस्तेमाल किए। इनसे पैदा हुए कंपन और दूसरे संकेतों को रिकॉर्ड किया गया। जमीन के नीचे छिपा परमाणु धमाका पकड़ना मुश्किल क्यों? आमतौर पर जमीन के नीचे परमाणु धमाका होने पर आसपास की जमीन में तेज कंपन पैदा होता है। यह कंपन कुछ हद तक भूकंप जैसा होता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लगे सेंसर ऐसे कंपन को रिकॉर्ड करते हैं। वैज्ञानिक इन संकेतों का अध्ययन करके यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि कहीं परमाणु परीक्षण तो नहीं हुआ। लेकिन समस्या तब होती है जब धमाके के संकेतों को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिश की जाए। इसे ‘डिकपलिंग’ कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो विस्फोट को ऐसी जगह करने की कोशिश की जाती है, जहां उसकी ताकत का कुछ हिस्सा जमीन के बाहर तक कम पहुंचे। इससे सेंसर को मिलने वाला कंपन कमजोर हो सकता है और परीक्षण को पहचानना मुश्किल हो सकता है। अमेरिका का नया प्रयोग इसी तरह के छोटे या कम संकेत देने वाले विस्फोटों को पहचानने की क्षमता बेहतर करने से जुड़ा है। चीन ने अमेरिका के आरोप को खारिज किया था अमेरिका का आरोप है कि चीन ने 22 जून 2020 को शिनजियांग के लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र में सीक्रेट भूमिगत परमाणु परीक्षण किया था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, वहां 2.75 तीव्रता का भूकंपीय झटका रिकॉर्ड हुआ था। उनका दावा था कि यह सामान्य भूकंप या खनन से हुआ धमाका नहीं था। अमेरिका का कहना है कि चीन ने ‘डिकपलिंग’ तकनीक अपनाई, जिसमें धमाके को जमीन के अंदर बड़ी गुफा में किया जाता है। इससे निगरानी सिस्टम में झटके रिकॉर्ड नहीं होते। चीन ने आरोपों को पूरी तरह खारिज किया था। उसका कहना है कि उसने कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया और अमेरिका बिना सबूत के आरोप लगा रहा है। वहीं, CTBTO ने कहा था कि उसके निगरानी नेटवर्क को उस दिन परमाणु परीक्षण का कोई साफ संकेत नहीं मिला। दो छोटे भूकंपीय झटके जरूर दर्ज हुए, लेकिन यह तय नहीं हो सका कि वे भूकंप, किसी दूसरे धमाके या परमाणु परीक्षण की वजह से थे। ——————— ये खबर भी पढ़ें… जिनपिंग के बॉडीगार्ड की पहचान उजागर:व्हाइट हाउस की गेस्ट लिस्ट में नाम-पद सामने आया चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई साल से एक अधिकारी विदेश दौरों और बड़ी बैठकों में नजर आता रहा है। वह कभी शी के पीछे खड़ा दिखा तो कभी उनके साथ मीटिंग में बैठा नजर आया। पूरी खबर यहां पढ़ें…



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