सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। 2015 में शुरू हुई लड़ाई को 10 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से पर काबिज हैं। वे सऊदी अरब के अंदर तक ड्रोन और मिसाइलों से हमले करने की क्षमता रखते हैं। हालात अब ऐसे हैं कि सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा के लिए लगातार पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। वहीं, हूती पीछे हटने के बजाय सऊदी के एयरपोर्ट और तेल रिफाइनरियों पर हमला कर रहे हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। अमेरिकी हथियार हूतियों के खिलाफ बेअसर क्यों? सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और दुश्मन के हमलों को रोकने वाले एयर डिफेंस सिस्टम हैं। अमेरिका उसे हथियारों के साथ खुफिया जानकारी और तकनीकी मदद भी देता रहा है। इसके बावजूद हूतियों के खिलाफ निर्णायक जीत नहीं मिल सकी। इसकी एक बड़ी वजह हमले और बचाव पर होने वाला खर्च है। हूती सस्ते ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी ओर, इन हमलों को रोकने के लिए सऊदी अरब को कई बार महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ती हैं। यानी हूतियों को हमला करने में जितना पैसा खर्च होता है, उससे कहीं ज्यादा रकम सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा में लगानी पड़ सकती है। इससे लंबे समय तक लड़ाई जारी रखना महंगा हो जाता है। सऊदी के लिए यमन का पहाड़ी इलाका भी बड़ी चुनौती यमन का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है। ऐसे इलाकों में विद्रोहियों के ठिकानों का पता लगाना और उन्हें पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होता। हवाई हमलों से किसी ठिकाने को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन इससे पूरे इलाके पर कब्जा नहीं मिलता। हूती लंबे समय से यमन में सक्रिय हैं और वहां उनकी मजबूत पकड़ है। उन्हें पूरी तरह हटाने के लिए सऊदी अरब को बड़ा जमीनी अभियान चलाना पड़ सकता है। इसमें सैनिकों के मारे जाने और युद्ध लंबे समय तक चलने का खतरा है। ईरान की मदद से हूतियों की ताकत बढ़ी सऊदी अरब और उसके सहयोगी ईरान पर हूतियों को हथियार और तकनीकी मदद देने का आरोप लगाते रहे हैं। ईरान और हूतियों के संबंध इस संघर्ष को क्षेत्रीय राजनीति से भी जोड़ते हैं। इस वजह से सऊदी अरब के लिए लड़ाई सिर्फ यमन के विद्रोहियों तक सीमित नहीं रहती। हूतियों के खिलाफ कार्रवाई बढ़ने पर ईरान के साथ तनाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में सैन्य कार्रवाई का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ने का खतरा रहता है। तेल-गैस की कमाई में हिस्सा क्यों मांग रहे हूती? यमन में तेल और गैस से होने वाली कमाई लंबे समय से विवाद का मुद्दा रही है। हूती चाहते हैं कि इस पैसे का इस्तेमाल सरकारी कर्मचारियों के वेतन और दूसरी जरूरतों को पूरा करने में हो। वे तेल-गैस से मिलने वाले राजस्व में हिस्सेदारी की मांग भी करते रहे हैं। तेल की कमाई पर नियंत्रण का मतलब सिर्फ पैसा नहीं है। इससे यह भी तय होता है कि यमन में किसका राजनीतिक और आर्थिक दबदबा रहेगा। इसलिए तेल-गैस के राजस्व का बंटवारा किसी भी समझौते में बड़ा मुद्दा बन सकता है। हूतियों के लिए यह मांग सऊदी अरब और यमन की सरकार पर दबाव बनाने का एक तरीका भी है।
एयरपोर्ट और तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता हाल ही में सऊदी अरब के एयरपोर्ट और तेल-गैस ठिकानों पर हूतियों के हमले हुए हैं। इनमें रियाद का किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी शामिल है। हमलों के कारण उड़ानों और तेल कारोबार की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। सऊदी अरब ने कुछ मिसाइलों को हवा में ही रोकने की जानकारी दी है। सऊदी अरब के सामने हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने, यमन में जमीनी अभियान बढ़ाने या बातचीत के जरिए समझौते की कोशिश करने जैसे विकल्प हैं। लेकिन हर रास्ते के साथ जोखिम जुड़ा है।
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सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा:अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर; अब तेल-गैस की कमाई में हिस्सा मांग रहे विद्रोही | ACTPnews

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