28 फरवरी को जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू हुई थी, तभी माना जा रहा था कि इसमें ईरान के सहयोगी हूती विद्रोही भी कूद सकते हैं। करीब पांच महीने बाद वही आशंका सच साबित होती दिख रही है। पिछले एक हफ्ते में हूतियों ने सऊदी अरब और रेड सी में जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन से कई हमले किए हैं। जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने भी हूती ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। यानी करीब चार साल से किसी तरह टला हुआ यमन का युद्ध फिर भड़कने की कगार पर है। हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया है, जबकि दोनों तरफ से हमले लगातार बढ़ रहे हैं। इससे मिडिल ईस्ट में एक नई जंग शुरू होने का खतरा बढ़ गया है। हूती और सऊदी के बीच विवाद की शुरुआत हूती और सऊदी के बीच ताजा विवाद 13 जुलाई को शुरू हुआ। दरअसल, कुछ हूती नेता अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद ईरान से यमन लौट रहे थे। लेकिन यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने इस प्लेन को सना एयरपोर्ट पर उतरने ही नहीं दिया। यमन सरकार का कहना था कि हूती अधिकारी यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं हूती ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। नतीजतन, हूती नेताओं वाला प्लेन सना एयरपोर्ट पर उतर ही नहीं सका। प्लेन ने अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो हूतियों के कंट्रोल में है। इस घटना के बाद हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया। शुरुआत में ईरान जंग से दूर रहे हूती विद्रोही फरवरी में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब हूती विद्रोही सीधे इस लड़ाई में उतरने से बचते दिखे। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद उनका रुख बदल गया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने हूतियों पर जंग में सक्रिय भूमिका निभाने का दबाव बनाया। हालांकि उनका कहना है कि इससे सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि हूतियों को भी फायदा है। वे इस मौके का इस्तेमाल यमन में अपनी राजनीतिक पकड़ और ताकत बढ़ाने के लिए करना चाहते हैं। 4 साल से यमन-सऊदी के बीच जंग रूकी थी 2022 में हुए युद्धविराम के बाद यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लड़ाई लगभग रुक गई थी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं था कि दोनों पक्षों के बीच विवाद खत्म हो गया था। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में स्थायी शांति समझौते पर बातचीत भी शुरू हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। तनाव बना रहा, मगर दोनों पक्ष बड़े युद्ध से बचने की कोशिश करते रहे। अब अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद हालात तेजी से बदल गए हैं। पिछले कुछ हफ्तों में हूती और सऊदी अरब के बीच फिर टकराव बढ़ा है और चार साल पुराना युद्धविराम टूटने की कगार पर पहुंच गया है। हूती से जंग नहीं चाहता सऊदी अरब सऊदी अरब इस समय हूतियों के साथ फिर युद्ध नहीं चाहता। इसकी वजह पिछला संघर्ष है, जो करीब एक दशक तक चला। इस लड़ाई में सऊदी अरब ने अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन उसे कोई निर्णायक सफलता नहीं मिली। उल्टा उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा और युद्ध, भूख व बीमारियों की वजह से लाखों यमनियों की जान चली गई। दूसरी ओर, हूतियों को लगता है कि सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाकर वे अपनी शर्तें मनवा सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, वे यमन के तेल से होने वाली कमाई में ज्यादा हिस्सा और देश की राजनीति में बड़ी भूमिका चाहते हैं। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी कहते हैं, हूतियों के लिए हर समस्या का एक ही जवाब है- युद्ध। वहीं सऊदी अरब हर समस्या को पैसे से सुलझाने की कोशिश करता है, जबकि हूती हथियारों से जवाब देते हैं। ईरान की मदद से मजबूत हुए हूती विद्रोही हूती कभी यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में सक्रिय शिया विद्रोहियों का एक छोटा समूह थे। उनका नारा था- “अमेरिका और इजराइल की मौत।” 2011 में ट्यूनीशिया से शुरू हुई अरब क्रांति की लहर यमन भी पहुंची। उस समय राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह करीब 33 साल से सत्ता में थे। युवाओं के प्रदर्शन की वजह से उनकी गद्दी छीन गई। फरवरी 2012 में अब्दरब्बू मंसूर हादी राष्ट्रपति बने। लेकिन उनकी सरकार कमजोर थी। हूती विद्रोहियों ने इसका फायदा उठाया और सितंबर 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को वहां से हटा दिया। हालात इतने बिगड़ गए कि 2015 में राष्ट्रपति हादी को देश छोड़कर सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी। सऊदी ने 2015 में हूती के खिलाफ जंग शुरू की हादी के पद छोड़ने के बाद से यमन पर किसी एक सरकार का कंट्रोल नहीं रह गया। इससे पड़ोस के सऊदी अरब को खतरा महसूस हुआ क्योंकि हूती का समर्थन ईरान कर रहा था। ऐसे में सऊदी ने 2015 में आठ अरब देशों के साथ मिलकर सैन्य गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ जंग शुरू कर दी। इस गठबंधन का मकसद राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर सत्ता में लाना था। करीब आठ साल तक लड़ाई के बाद सऊदी अरब को समझ आ गया कि सिर्फ सैन्य ताकत से हूतियों को हराना संभव नहीं है। इसके बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और सीधे हूती नेताओं से संपर्क शुरू किया। आज उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का नियंत्रण है। वहीं दक्षिणी यमन अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में है, लेकिन वह आर्थिक और सैन्य मदद के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। गाजा युद्ध ने बिगाड़ दिया शांति समझौता 2022 में युद्धविराम लागू होने के बाद पहली बार लगा कि यमन में स्थायी शांति लौट सकती है। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में सऊदी अरब और हूतियों के बीच समझौते पर बातचीत आगे बढ़ रही थी। दोनों पक्ष ऐसे फॉर्मूले पर काम कर रहे थे, जिससे वर्षों पुराना युद्ध खत्म हो सके। सबसे बड़ा विवाद यमन के तेल से होने वाली कमाई और सरकारी कर्मचारियों के वेतन को लेकर था। इसके बावजूद दोनों पक्ष समझौते के काफी करीब पहुंच चुके थे। लेकिन अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होते ही पूरी तस्वीर बदल गई। हूतियों ने खुद को हमास के समर्थन में उतार दिया और लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। इसके जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके बाद शांति वार्ता धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चली गई। हूती ने सऊदी पर वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगाया गाजा युद्ध के दौरान हूतियों ने सऊदी अरब पर सीधे हमले नहीं किए। लेकिन उन्होंने रेड सी से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इससे दुनिया के कई देशों का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ। इसके बाद 2025 में राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने हूतियों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया और उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू कर दिए। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी का कहना है कि इस फैसले से हूतियों के कब्जे वाले इलाकों की पहले से खराब अर्थव्यवस्था और बिगड़ गई। इससे वहां रहने वाले लोगों में नाराजगी भी बढ़ने लगी। न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने मौजूदा तनाव के लिए सऊदी अरब को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप है कि सऊदी अरब ने शांति वार्ता के दौरान किए गए वादे पूरे नहीं किए। खासकर हूती नियंत्रित इलाकों के सरकारी कर्मचारियों की रुकी हुई तनख्वाह बहाल नहीं की गई। हालांकि सऊदी अरब ने इन आरोपों से इनकार किया है। यमन में सऊदी राजदूत मोहम्मद अल-जाबेर ने कहा कि उनका देश तनाव कम करना चाहता है और यमन में स्थायी शांति का समर्थन करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि हूती लगातार हिंसा का रास्ता चुन रहे हैं और बाहरी ताकतों के हितों के लिए काम कर रहे हैं, जिसका नुकसान यमन की जनता को उठाना पड़ रहा है।
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मिडिल ईस्ट में शुरू हो सकती है एक नई जंग:सऊदी अरब का यमन की राजधानी सना पर हमला, हूती ने शुरू की समुद्री नाकेबंदी | ACTPnews

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