‘आप एक्टिंग छोड़ो, एयरफोर्स जॉइन करो’:अभय वर्मा को मिला यह कॉम्प्लीमेंट, बोले- इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए शायद कुछ हो ही नहीं सकता | ACTPnews

‘आप एक्टिंग छोड़ो, एयरफोर्स जॉइन करो’:अभय वर्मा को मिला यह कॉम्प्लीमेंट, बोले- इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए शायद कुछ हो ही नहीं सकता

अभिनेता अभय वर्मा इन दिनों ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में भारतीय वायुसेना के अधिकारी आरएस धालीवाल का किरदार निभाकर चर्चा में हैं। इस भूमिका ने उन्हें अभिनेता के तौर पर चुनौती दी और देश के अनसंग हीरोज को करीब से समझने का मौका दिया। अभय बताते हैं कि एयरफोर्स स्टेशन में जवानों से मुलाकात, मिग-21 में बैठने और पूर्व एयर चीफ मार्शल धनोआ से मिलने के अनुभव उनके लिए बेहद भावुक और प्रेरणादायक रहे। धालीवाल के परिवार से मुलाकात को वह अपने करियर का खास सम्मान मानते हैं। उन्होंने युद्ध, परिवार, वर्दी और देश के लिए बलिदान पर भी बात की। सवाल: ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में काम करने का आपकी जिंदगी पर कितना असर पड़ा? जवाब: मेरे लिए एक्टिंग का एक ही फंडा है कि मैं हर दिन एक बेहतर इंसान बनूं। पिछले किरदार से जितनी खूबियां सीखूं, उन्हें अगले प्रोजेक्ट में इस्तेमाल करूं और एक बेहतर एक्टर बनूं। ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में हमारे देश के हीरोज को निभाने का मौका मिला। इसके साथ बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी महसूस हुई। आज हम अपने परिवार के साथ चैन से सोते हैं, देश पर गर्व करते हैं और हमारे युवा सेना में जाने का सपना देखते हैं, तो इसमें इन अनसंग हीरोज का बहुत बड़ा योगदान है। एक्टर के तौर पर ऐसा किरदार मिलना मेरे लिए किसी एथलीट के ओलंपिक के लिए चुने जाने जैसा है। सवाल: आपका जन्म 27 जुलाई 1998 को हुआ और कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई 1999 को था। जब आपने कारगिल और ऑपरेशन सफेद सागर को करीब से समझा तो क्या महसूस हुआ? जवाब: जब कारगिल युद्ध हुआ, तब मैं सिर्फ एक साल का था। उस समय मुझे कुछ पता नहीं था, लेकिन ‘कारगिल’ शब्द बहुत मशहूर हो गया था। बाद में किताबों के जरिए इसके बारे में जाना। ‘ऑपरेशन विजय’ के बारे में तो हम बहुत सुनते आए हैं, लेकिन ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ की कहानी हमारे सामने नहीं आई थी। जब पहली बार डायरेक्टर ने इसके बारे में बताया तो मैंने उनसे पूछा- ‘सर, ये सच में हुआ था?’ सवाल बचकाना था, लेकिन कहानी इतनी अविश्वसनीय थी कि मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा हुआ भी था और हमें पता भी नहीं। सबसे खास बात यह थी कि मैं पहले से अपने हीरो के बारे में सोचकर नहीं आया था। किरदार निभाते-निभाते आरएस धालीवाल मेरे हीरो बन गए। उनकी बहादुरी, जज्बा और साहस ने मुझे बहुत प्रभावित किया। सवाल: एयरफोर्स के लोगों से मिलने पर आपको अपने किरदार की अहमियत कैसे महसूस हुई? जवाब: जब मैं एयरफोर्स स्टेशन में लोगों से मिला और बताया कि मैं आरएस धालीवाल का किरदार निभा रहा हूं, तो उनकी आंखों में अलग चमक आ गई। उनकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई। एक व्यक्ति ने दोबारा मेरा हाथ मिलाकर कहा, ‘आप धाली को प्ले कर रहे हैं?’ हाल ही में रात में पुलिस अल्कोहल चेक कर रही थी। मैंने शीशा नीचे किया तो हवलदार ने मुझे दो बार देखा और पूछा कि आपने धाली का किरदार निभाया है ना? उन्होंने जाते-जाते दोबारा हाथ मिलाया। हमारे हीरोज के लिए लोगों के मन में जो सम्मान है, उसे महसूस करना मेरे लिए खास था। सवाल: आरएस धालीवाल बहुत कम बोलने वाले, आत्मविश्वासी और निडर अधिकारी थे। उन्हें निभाने की तैयारी कैसे की? जवाब: सबसे पहले तो मुझे डर लग रहा था, क्योंकि वह बहुत कम बोलते थे और मैं बहुत बोलता हूं। यही मेरी पहली चुनौती थी। हालांकि असली तैयारी हमारे डायरेक्टर और राइटर ने कराई। मुझे लगता है कि हर इंसान जो वर्दी पहनता है, वह भगवान का भेजा हुआ इंसान है। वह हमें बचाने के लिए वर्दी पहनता है, बिना कुछ मांगे अपना काम करता है। यह गुण मैंने अपनी मां और इन हीरोज में देखा है। वे कुछ कर जाते हैं, लेकिन उसके बारे में बताते नहीं हैं। मेडल नहीं मांगते। बस अपना काम करते हैं। हमारे शो में भी एक लाइन है कि वर्दी ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई राह चलता आदमी खरीदकर पहन ले। जिसे इसे पहनने का मौका मिलता है, वह आम इंसान से ऊपर होता है। मैं आखिरी दिन तक खुद को तैयार करता रहा, लेकिन मुझे लगता है कि ऐसे लोगों जैसा पूरी तरह बनना संभव नहीं है। हम सिर्फ उनके जैसा बनने की कोशिश कर सकते हैं। सवाल: इस प्रोजेक्ट का ऑडिशन कैसे हुआ? जवाब: मैंने पहले ऑडिशन दिया था। वह ऑडिशन मुकेश छाबड़ा सर के ऑफिस में हुआ था। वह हर प्रोजेक्ट में कोशिश करते हैं कि मैं ऑडिशन दूं। मुझे यह बात अच्छी लगती है कि इंडस्ट्री में कुछ काम करने के बाद भी ऑडिशन देने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। ऑडिशन पसंद आने के बाद जब मैं डायरेक्टर से मिला तो उन्होंने मुझे ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के बारे में विस्तार से बताया। मैं हैरान था कि ऐसा कुछ हमारे इतिहास में हुआ है और हमें इसके बारे में ज्यादा पता नहीं है। मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह थी कि मुझे वर्दी पहनने और एक ऐसे इंसान को निभाने का मौका मिलेगा, जो आने वाली पीढ़ी के लिए उदाहरण है। सवाल: आपको दर्शकों से सबसे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या मिला? जवाब: एक व्यक्ति ने मुझे डीएम किया और लिखा- ‘आप एक्टिंग छोड़ो, एयरफोर्स जॉइन कर लो।’ इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता। इसके अलावा एयर चीफ एपी सिंह जी मुझसे मिले और उन्होंने कहा, ‘यार, तू लग रहा है। तुमने कमाल का काम किया है।’ यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। एयरफोर्स के सबसे बड़े अधिकारी जब आपके काम की तारीफ करें और आशीर्वाद दें तो उससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता है। सवाल: धालीवाल की बेटी से मुलाकात कैसी रही? जवाब: स्क्रीनिंग के दौरान उनकी बेटी से मुलाकात हुई। वह दो मिनट की भावुक मुलाकात थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि मुझसे क्या कहें और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनसे क्या कहूं। ऐसा लग रहा था कि वह मेरी आंखों में अपने पिता की झलक देख रही हैं और मैं उनकी आंखों में धालीवाल साहब का एक हिस्सा देख रहा था। हम दोनों के पास शब्द कम पड़ गए थे। बस यही इच्छा थी कि जहां भी धालीवाल सर हों, उन्हें हम पर गर्व महसूस हो। सवाल: एयरफोर्स स्टेशन और मिग-21 के साथ शूटिंग का अनुभव कैसा रहा? जवाब: जब पहली बार एयरफोर्स स्टेशन में गया तो सबसे पहले फोन जमा हुआ। अंदर जाने से पहले बैकग्राउंड चेक भी हुआ। लेकिन अंदर जाने के बाद मुझे सबसे ज्यादा जो चीज महसूस हुई, वह थी एकता। सीनियर से जूनियर तक सभी एक-दूसरे के लिए तैयार थे। मुझे लगा कि अगर हमारा पूरा देश एयरफोर्स बेस की तरह एकजुट हो जाए तो कितना खूबसूरत होगा। पूर्व एयर चीफ मार्शल बीरेंद्र सिंह धनोआ सर से मिलने का भी मौका मिला। इतने बड़े लेजेंड होने के बावजूद वह कमरे में सबसे मजाकिया इंसान थे। इतने बड़े फैसले लेने वाले और देश के लिए युद्ध लड़ चुके इंसान का इतना सरल होना मेरे लिए प्रेरणादायक था। मिग-21 में बैठने का अनुभव शब्दों में बताना मुश्किल है। हम उन आखिरी कुछ नागरिकों और एक्टर्स में हैं, जिन्हें मिग-21 में बैठने का मौका मिला। इसी विमान ने हमारे लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और कारगिल में भी अहम भूमिका निभाई। एक दिन हमारे सामने फाइटर जेट का लो फ्लाइंग शो हुआ। जेट करीब डेढ़ किलोमीटर दूर था, लेकिन उसकी आवाज इतनी तेज थी कि हमें शूटिंग रोकनी पड़ी। जब हमने उसे आसमान में जाते देखा तो मेरी और सिद्धार्थ सर की आंखें नम हो गईं। हमने एक-दूसरे को गले लगाया और भगवान को धन्यवाद दिया कि हमें यह देखने का मौका मिला। सवाल: युद्ध की कहानी में आपने भावनाओं और परिवार के पक्ष को कैसे निभाया? जवाब: मुझे लगता है कि अगर परिवार का एक व्यक्ति सेना में जाता है तो सिर्फ वह व्यक्ति नहीं जाता, पूरा परिवार उसके साथ जाता है। उसकी पत्नी भी अपना युद्ध लड़ती है और बच्चा भी अनजाने में उस संघर्ष का हिस्सा होता है। एक सैनिक देश के लिए लड़ रहा है, लेकिन उसके पीछे उसका परिवार भी खड़ा है। हर सफल सैनिक के पीछे एक और बड़ा सैनिक होता है, जो घर संभाल रहा है और यह जानते हुए भी परिवार को संभालता है कि उसका पति शायद वापस आए या नहीं। मेरे लिए युद्ध से ज्यादा जरूरी इंसान और रिश्ते हैं। मुझे लगता है कि युद्ध नहीं होना चाहिए। सीमाओं की रक्षा होनी चाहिए, लेकिन युद्ध नहीं। सवाल: पूरी स्टारकास्ट के बीच इतना अच्छा रिश्ता कैसे बना? जवाब: हम करीब ढाई साल से एक साथ हैं और अब भाइयों जैसे हो गए हैं। अगर किसी एक कलाकार के बारे में अच्छी खबर आती है तो हमें लगता है कि हमारी तारीफ हो रही है। हमने ‘गोल्डन एरोज’ और नंबर 17 स्क्वाड्रन वाली भावना को सच में अपना लिया है। हम एक-दूसरे के विंगमैन बन गए हैं। इस शो की सबसे बड़ी ताकत भी यही है कि अकेले जीतना बड़ी जीत नहीं है, सबके साथ जीतना बड़ी बात है। सिर्फ लड़कों की बात नहीं है, प्रजक्ता मैम और अमृता बख्शी ने भी शानदार काम किया है। वीर नारी अलका हौजा का किरदार भी बहुत खूबसूरती से निभाया गया है। सवाल: आपकी मां ने आपकी जर्नी में कितना योगदान दिया है? जवाब: मेरी मां मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणाओं में से एक हैं। मैंने उनमें भी यही देखा है कि कुछ कर जाना और उसके बारे में कुछ न कहना। जब धालीवाल साहब के परिवार से मिला और उनकी आंखों में वह चमक देखी तो लगा कि मेरा मेडल मुझे मिल गया। उन्होंने कहा कि मैंने बहुत अच्छा काम किया है। मेरे लिए यह बहुत बड़ा सम्मान है, क्योंकि मैं यह किरदार अपने हीरो को ध्यान में रखकर निभा रहा था। सवाल: आपकी टी-शर्ट पर मिग-21 बना हुआ है। इसके पीछे क्या कहानी है? जवाब: एयरफोर्स की वर्दी पहनने का मौका मिला, लेकिन एयरफोर्स से बाहर यह टी-शर्ट मेरी वर्दी है। मैं इसे गर्व के साथ पहनता हूं। स्क्रीनिंग से कुछ दिन पहले एयरफोर्स के अधिकारी सिंघा सर से मैंने मजाक में कहा था कि आप मेरे लिए कुछ लेकर नहीं आए। उन्होंने कहा कि अगली बार जरूर लाऊंगा। मैं भूल गया था। करीब एक महीने बाद जब वह मिले तो मेरे लिए मिग लेकर आए। तब से जब भी मौका मिलता है, मैं इसे अपने साथ रखता हूं। यह मेरे लिए सिर्फ टी-शर्ट नहीं है। यह उस किरदार और हमारे देश के हीरोज की याद है। मिग-21 ने हमारे देश के लिए लड़ाइयां जीती हैं। इसलिए मेरे लिए इससे ज्यादा कीमती और गर्व की चीज शायद कुछ नहीं हो सकती।



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