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DRDO AHAP Parachute Test in Ladakh


48 मिनट पहले

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DRDO ने मंगलवार को लद्दाख के न्योमा में एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट का पहला लाइव जंप किया। पैराट्रूपर्स ने 16,000 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई। पैराशूट 15,500 फीट पर खुला और जवानों ने ड्रॉप जोन में सुरक्षित लैंडिंग की।

यह ऊंचाई वाले इलाकों में पैराट्रूपर्स को बड़ी संख्या में उतारने वाला स्टैटिक लाइन पैराशूट सिस्टम है। यह जंप लद्दाख में न्योमा मदह ड्रॉप जोन में की गई, जो दुनिया के सबसे ऊंचे ड्रॉप जोन में से एक है।

इस सिस्टम को आगरा के ‘एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट’ (ADRDE) ने बनाया है।

देखिए पैराशूट जंप की तस्वीरें…

पैराशूट की खासियत- यह 18 हजार फीट से जंप कर सकता है

यह परीक्षण बेहद ऊंचाई वाले इलाकों के लिए देश में बने AHAP पैराशूट की क्षमता और सैन्य उपयोग को परखने के लिए किया गया। इसकी जांच डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ एयरोनॉटिकल क्वालिटी एश्योरेंस (DGAQA) ने की है।

इसे सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थिनेस एंड सर्टिफिकेशन (CEMILAC), RCMA कानपुर ने प्रमाणित किया है। मंत्रालय ने कहा कि एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड में पैराशूट खोलने के कई तरीके हैं। इसकी ऑपरेशनल ऊंचाई की सीमा 18,000 फीट तक है।

यह भारतीय सेना के ऊंचाई वाले इलाकों की सैन्य जरूरतों के लिए खास तौर पर उपयोगी है। इतनी ऊंचाई पर स्टैटिक लाइन पैराशूट जंप करना मुश्किल और जोखिम भरा होता है। इसकी वजह पैराशूट खुलने पर लगने वाला बहुत तेज झटका और नीचे उतरने की रफ्तार है।

सेना को होने वाले फायदे

ऊंचाई पर तैनाती: यह पैराशूट सिस्टम खास तौर पर 18,000 फीट तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों (जैसे लद्दाख) में काम करने के लिए बनाया गया है। इससे सेना उन दुर्गम इलाकों में भी सैनिकों को तेजी से पहुंचा सकती है जहां सड़क या दूसरे साधनों से पहुंचना मुश्किल होता है।

मास ड्रॉप क्षमता: यह एक ‘स्टैटिक लाइन पैराशूट सिस्टम’ है, जिसे ‘मास ड्रॉप’ के लिए बनाया गया है। यानी, एक साथ बड़ी संख्या में पैराट्रूपर्स (सैनिकों) को बहुत कम समय में एक सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतारा जा सकता है।

सुरक्षा: इतनी ऊंचाई पर पैराशूट जंप करना बेहद जोखिम भरा होता है क्योंकि वहां हवा कम होती है और ‘ओपनिंग शॉक’ (खुलने का झटका) बहुत तेज होता है। AHAP की खासियत यह है कि यह बहुत सुरक्षित तरीके से नीचे उतरने की गति प्रदान करता है, जिससे सैनिकों को चोट लगने का खतरा कम हो जाता है।

रणनीतिक लचीलापन: यह सिस्टम कई तरह के ‘डिप्लॉयमेंट मोड’ (खुलने के तरीके) देता है, जिससे सेना अपनी जरूरत और जमीनी हालातों के हिसाब से इसका इस्तेमाल कर सकती है।

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